Sunday, November 13, 2011

पहले दो, पीछे पाओ

यह विचारणीय प्रश्न है कि महापुरुष अपने पास आने वालों से सदैव याचना ही
क्यों करता है? मनन के बाद मेरी निश्चित धारणा हो गई कि त्याग से बढ़कर
प्रत्यक्ष और तुरंत फलदायी और कोई धर्म नहीं है। त्याग की कसौटी आदमी के
खोटे- खरे रूप को दुनिया के सामने उपस्थित करती है। मन में जमे हुए
कुसंस्कारोँ और विकारोँ के बोझ को हल्का करने के लिए त्याग से बढ़कर अन्य
साधन नहीं हो सकता।
आप दुनिया से प्राप्त करना चाहते हैं, विद्या, बुद्धि संपादित करना चाहते
हैं, तो त्याग कीजिए। गाँठ में से कुछ खोलिए। कोई नियामत लूट के माल की
तरह मुफ्त नहीं मिलती। दीजिए, आपके पास पैसा, रोटी, विद्या, श्रद्धा,
सदाचार, भक्ति, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ हो, मुक्त हस्त होकर दुनिया को
दीजिए, बदले में आपको बहुत कुछ मिलेगा। गौतम बुद्ध ने राजसिंहासन छोड़ा,
गाँधी ने बैरिस्टरी छोड़ी, उन्होंने जो छोड़ा था उससे अधिक पाया। विश्व कवि
रवींद्र नाथ टैगोर ने अपनी एक कविता में कहते हैं, "उसने हाथ फैला कर मुझ
से कुछ माँगा। मैंने अपनी झोली में से अन्न का एक दाना उसे दे दिया। शाम
को मैंने देखा कि झोली में उतना ही छोटा सोने का दाना मौजूद था। मैं फूट-
फूट कर रोया कि क्यों न मैंने अपना सर्वस्व दे डाला, जिससे मैं भिखारी से
राजा बन जाता।"
- अखण्ड ज्योति, मार्च- 1940, पृष्ठ 9

--
durgadatt c.

Thursday, November 10, 2011

उद्देश्य ऊँचा रखें

मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते हैं, उतनी आसानी से सोना नहीं
मिलता। इसी तरह पापोँ की ओर आसानी से मन चला जाता है, किंतु पुण्य कर्मों
की ओर मन को प्रवृत्त करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा
नीचे पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किंतु यदि पानी ऊँचे स्थान पर
चढ़ाना हो तो, कुछ विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है।
बुरे विचार, तामसी संकल्प बड़ा मनोरंजन करते हुए मन में घर बना लेते हैं
और साथ ही अपनी मारक शक्ति को भी ले आते हैं। स्वार्थपूर्ण नीच भावनाओं
का वैज्ञानिक विश्लेषण कर के पता चला है कि वे काले रंग की छुरियोँ के
समान तीक्ष्ण एवं तेजाब की तरह दाहक होती हैं।
विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्वों की भाँति खींचने और खिँचने की विशेषता
होती है। स्थान मिलने पर अपनी भावना को पुष्ट करने वाले एक ही जाति के
विचार उड़ उड़ कर एकत्रित होने लगते हैं। यह तथ्य बुरे, तामसी विचार और भले
विचार सभी के संबंध में सत्य है।
जिन्होंने बहुत समय तक बुरे, तामसी और स्वार्थपूर्ण विचारों को अपने मन
में स्थान दिया है, उनके लिए इन विचारों को बाहर निकालना बहुत कठिन होता
है और ऐसे लोगों को चिंता, भय और निराशा जैसी परेशानियों का शिकार होना
ही पड़ेगा।

Sunday, November 6, 2011

उठो! हिम्मत करो

स्मरण रखिए, रुकावटें और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों
का ठीक- ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए
हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में
रुकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जीवन का स्वाद
ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी- बड़ी
कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन
कहला सकता है।
उठो! उदासीनता त्याग दो। प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं।
उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा है। उन्होंने जो श्रम आपके
ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह जीवन तभी तक दुःखमय दिखता
है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही
वृक्ष का उद्भव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध करते
हैं।
सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतोँ का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान
है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस
विश्वास द्वारा आप सब कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके
सामने ठहर नहीं सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आंतरिक
शक्तियों का विकास करेगा।
- अखण्ड ज्योति, फरवरी 1940, पृष्ठ 9

Wednesday, September 14, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 5

सोने के लिए हमारे पास समय काफी कम बचा था और थकान काफी थी इसलिए हमने
अपने मोबाइल फोन में अलार्म सेट कर दिए थे। शाम को पूछताछ करने के बाद
हमने यह अनुमान लगाया था कि कटरा से सुबह करीब साढ़े छः बजे निकला जाए तो
जम्मू नौ बजे तक पहुँचा जा सकता है। हम सुबह छः बजे होटल से निकले। योजना
यह थी कि पहले माँ और
आदित्य जम्मू के लिए जाएँगे। उनकी गाड़ी सुबह नौ बजे थी- दिल्ली के लिए।
दरअसल उन्हें पुणे जाना था और जम्मू से पुणे के लिए सीधी ट्रेन है- झेलम
एक्सप्रेस, लेकिन चूँकि हमारा कार्यक्रम काफी जल्दबाजी में बना था इसलिए
उस गाड़ी में उन्हें टिकट मिल नहीं पाया था और उन्हें पहले दिल्ली और बाद
में वहाँ से पुणे जाना था। हमारी गाड़ी रात को लगभग नौ बजे थी इसलिए हम
बाद में आराम से निकलने वाले थे। हम होटल से निकल कर बस स्टैंड की तरफ आए
तो पिछली शाम की स्थिति बिल्कुल बदल चुकी थी। माँ वैष्णो देवी के
दर्शनार्थियोँ की भारी भीड़ लम्बी पंक्तियों में खड़ी थी यात्रा पर्ची लेने
के लिए। पुलिस ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रबंध किए थे लेकिन वे
नाकाफी सिद्ध हो रहे सड़कों पर भारी जाम लगा था। कल तक जिन टैक्सी का
किराया छः सौ रुपए था आज वह बढ़कर नौ सौ से ज्यादा हो गया था। हम सब को
साथ जाना होता तो शायद हम टैक्सी ही बुक करते लेकिन दो लोगों के लिए इतना
किराया देकर पूरी टैक्सी बुक करना हमें जँच नहीं रहा था। तभी जम्मू की बस
आ गई और हमने माँ और आदित्य को बस से भेजने का निर्णय लिया। लेकिन हमारा
यह निर्णय बिल्कुल गलत साबित हुआ और इसका हमें काफी नुकसान उठाना पड़ा।
पूरे रास्ते में जाम लगा था और जम्मू में बस के लिए बड़ी गाड़ी होने की वजह
से रूट भी अलग था। कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ कि बस समय से नहीं पहुँची और
ट्रेन छूट गई। यह चिंता का विषय था हमारे लिए। लेकिन आदित्य ने काफी
सूझबूझ से काम लिया। उन्होंने अपना टिकट रद्द कराया और अगली गाड़ी में
सामान्य दर्जे का टिकट लिया क्योंकि उस गाड़ी का आरक्षण बंद हो चुका था।
शुक्र यह था कि उन्हें बैठने की जगह मिल गई थी गाड़ी में। दूसरी राहत की
बात यह थी कि दिल्ली से उन्हें दूसरी गाड़ी पकड़नी थी और इस बीच मार्जिन
समय काफी अच्छा था। यदि ऐसा नहीं होता तो लगभग एक हजार नौ सौ किलोमीटर की
यात्रा काफी दुरूह बन जाती।
माँ और आदित्य के जाने के बाद स्थिति को देखते हुए हमने समय से काफी पहले
निकलने का निर्णय लिया। टैक्सी के लिए काफी कोशिश की हमने लेकिन साढ़े आठ
सौ रुपए से कम में कोई तैयार नहीं हो रहा था और दूसरी तरफ हम इस तरह
ज्यादा किराया देने को तैयार नहीं थे। अभी दोपहर के बारह बज रहे थे और
हमारे पास समय काफी था। आखिर काफी मेहनत के बाद एक सज्जन मिल गए जो हमें
साढ़े छः सौ रुपए में जम्मू छोड़ने को तैयार हुए। कटरा से जम्मू आने में
हमें तीन घंटे से ज्यादा समय लगे और हम करीब शाम पाँच बजे जम्मू पहुँचे।
जम्मू स्टेशन पर प्रवेश करने से पहले यात्रियों की काफी जाँच पड़ताल होती
है और चौदह अगस्त की शाम होने से हमें कुछ ज्यादा ही सख्ती झेलनी पड़ी।
स्टेशन पर अपना सामान व्यवस्थित रखने के बाद सबसे पहले हमने भोजन की
समुचित व्यवस्था की क्योंकि हमें जोरों की भूख लग रही थी। इसके बाद मैंने
मेरे ससुरजी के टिकट का कंम्फर्म स्टेटस चेक किया क्योंकि पहले वह
प्रतीक्षा सूची में था। इसके बाद हमारे पास गाड़ी की प्रतीक्षा करने के
अलावा कोई काम नहीं बचा था। यह समय हमने आइसक्रीम खाते हुए और गाड़ी में
पढ़ने के लिए पत्रिकाएँ लेने में बिताया। अर्चना एक्सप्रेस जब प्लेटफार्म
पर आई तो काफी मशक्कत के बाद हम अपनी सीट तक पहुँचे। एक बढ़िया बात यह थी
कि जो यात्री थे केवल वही गाड़ी में थे। चढ़ाने वाला वहाँ कोई नहीं था।
वरना पटना से गाड़ी पकड़ते समय जितने यात्री थे उनसे दोगुने उन्हें छोड़ने
वाले थे और इस कारण से हमें काफी परेशानी उठानी पड़ी थी।
गाड़ी अपने नियत समय पर जम्मू से
निकली। अगले दिन
अखबार पढ़कर पता चला कि हमारे दर्शन करके वापस लौटने के कुछ ही घंटों के
बाद जबर्दस्त बारिश की वजह से अधकुँवारी के पास भू- स्खलन हुआ था जिसमें
कम से कम दो लोग मारे गए थे और एक दर्जन लोग घायल हो गए थे। कटरा में
एम्बुलेँस और पुलिस की भागदौड़ को हमने स्वतंत्रता दिवस की तैयारी का एक
हिस्सा समझ कर नजरअंदाज कर दिया था।
इस तरह एक हफ्ते की यात्रा में अनुष्का का मुंडन करके काफी घूमते फिरते,
सबसे मिलते हुए माताजी के दर्शन करने के बाद हम अपने घर की तरफ वापस चल
पड़े थे...

Wednesday, August 31, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 4

भैरव नाथ के मंदिर से कटरा की तरफ उतरने पर ढलान काफी तेज है और यात्री भी थके होते हैं। पैरों के थके होने से ढलान पर गति को नियंत्रित कर पाना भी कठिन होता है और ढलान के साथ तेज उतरना भी। माँ, पिताजी और ससुरजी तीनों ही काफी थक चुके थे। सुबह नहाने से हमारे पास कुछ गीले कपड़े थे और साथ में प्रसाद के कुछ थैले भी। दरअसल जम्मू के लिए निकलते समय कुछ मित्रों ने प्रसाद के लिए पैसे दिए थे और उनका प्रसाद भी हमारे साथ था। इन सब से हमारा सामान पहले से अधिक भारी हो गया था और इसका बड़ा भाग मेरे छोटे भाई साहब आदित्य के कंधों पर था। अनुष्का को लेकर चलते हुए मेरे कंधे भी जवाब दे रहे थे। इसलिए हमें चलने में काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। पर मेरे पिताजी और ससुरजी मेरी माँ और पत्नी प्रीति की धीमी चाल के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे। वे थोड़ी दूर आगे निकल जाते और फिर हमारे पहुँचने की प्रतीक्षा करते। अधकुँवारी से कुछ दूर पहले रुक कर पिताजी और ससुरजी हमारा इंतजार कर रहे थे और चाय भी पी रहे थे। जब हम पहुँचे तो उनकी चाय खतम हो रही थी इसलिए वे आगे बढ़ गए और हम रुक कर चाय पीने लगे। आदित्य को भी धीमे चलने से भार ज्यादा महसूस हो रहा था सो वे आगे बढ़ना चाहते थे। इसलिए हमने उन्हें भी यह कहकर जाने दिया कि जब थक जाएँ तो वहीँ रुक कर इंतजार करें।
हमने चाय पी और फिर आगे बढ़े। यहाँ से एक समस्या शुरू हुई लेकिन हमें इसका आभास नहीं हुआ। अब हम दो दलों में बँट गए थे- पहले दल में मेरे पिताजी, ससुरजी और आदित्य थे और दूसरे दल में मैं, मेरी माँ और प्रीति मेरी पत्नी थे। वो आगे चल रहे थे और हम थोड़ा पीछे लेकिन हमारी गति कम होने से दोनों दलों के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी। हम अधकुँवारी पहुँचे थोड़ा रुके और फिर आगे बढ़े। हमें थोड़ा आश्चर्य हो रहा था कि दूसरा दल यहाँ हमारे लिए रुका नहीं और सीधे आगे बढ़ गया। खैर कछुए की धीमी रफ्तार से चलकर हम जब नीचे मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुँचे तो शाम के पाँच बज रहे थे। हमने अपने दूसरे दल के लोगों को तलाशने की कोशिश की लेकिन वहाँ कोई नहीं दिखा तो हम बाहर निकल आए क्योंकि बाहर ही प्रायः लोग अपने पीछे से आते साथियों की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन आश्चर्य यहाँ भी कोई नहीं था। अब हम थोड़े परेशान भी थे और थोड़ी खीझ भी आ रही थी आखिर कहाँ जा कर बैठे हैं यह लोग। मैं अपने दल को छोड़कर उनकी तलाश में पीछे भी नहीं जा सकता था। हमने करीब पौन घंटा इंतजार किया कि शायद कहीं पीछे ही बैठे होंगे तो आ जाएँगे। जम्मू में एक और समस्या है- वहाँ सिर्फ पोस्ट पेड मोबाइल कनेक्शन ही चालू रहते हैं, प्री पेड कोई भी कनेक्शन नहीं। हमारे पास सिर्फ एक ही एक्टिव मोबाइल था जो मेरे पास था बाकी सभी के मोबाइल बंद थे। इस वजह से भी अब हमें काफी परेशानी थी। तभी आदित्य ने एक पे फोन से मुझे फोन किया तब हम कुछ आश्वस्त हुए। लेकिन अभी तो चौंकने का समय था। आदित्य बाहर आए तो वे अकेले थे, पिताजी और मेरे ससुरजी उनके साथ नहीं थे! आदित्य ने बताया कि वे उसे अधकुँवारी से ही नहीं मिले। अब एक ही अनुमान शेष था और हमारे लिए संभावना भी। हमें विश्वास था कि अवश्य पिताजी थके होने के कारण मेरे ससुरजी को साथ लेकर होटल चले गए होंगे क्योंकि इस दल के साथ मैं और आदित्य थे। हमने करीब बीस मिनट प्रतीक्षा करने के बाद होटल चलने का निश्चय किया। मन में एक ही बात आ रही थी कि काश वे दोनों लोग होटल पहुँच गए हों। लेकिन जब हम होटल पहुँचे तो पता चला कि वहाँ पिताजी नहीं पहुँचे हैं। अब परेशानी चिंता का सबब बन गई थी। हमने सबसे पहले एक कमरा बुक किया ताकि माँ और प्रीति को वहाँ छोड़ा जा सके। फिर हम वापस तीन किलोमीटर पीछे चलकर बाणगंगा गए। फिर हमने उद्घोषणा कक्ष में मिल कर पिताजी के लिए संदेश कहलवाया लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। फिर हमने मुख्य द्वार पर सुरक्षा कर्मियों से बात की और उन्हें खोजने अंदर गए। मैंने आदित्य को उद्घोषणा कक्ष के पास ही बैठा दिया ताकि संदेश सुनकर यदि पिताजी वहाँ आएँ तो मिल सकें। मैं पीछे चलता हुआ करीब बाणगंगा पहुँच गया लेकिन वे नहीं मिले। मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी। रात हो रही थी, यह लोग मिल नहीं रहे थे और अगली सुबह माँ और आदित्य की गाड़ी थी- पहले दिल्ली और बाद में वहाँ से पुणे के लिए। तभी मेरे ससुरजी का फोन आया जो उन्होंने होटल से किया था। मेरी तो जैसे जान में जान आ गई हो। लेकिन जब परेशानी आती है तो इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ती। उन्होंने बताया कि पिताजी काफी नीचे तक साथ आए थे लेकिन उसके बाद भीड़ में वे अलग हो गए थे। लेकिन उन्होंने बताया था कि वे बाणगंगा से आगे तक साथ में थे। इसलिए मैं फिर वापस उन्हें खोजता हुआ नीचे आने लगा। मुख्य द्वार पर आकर आदित्य से मिला। तभी मुख्य द्वार के पास ही पिताजी दिखाई दिए। अभी तक न जाने कितने संस्करणोँ में अनगिनत शंकाएँ आ रही थी वे सब जैसे एक साथ विलीन हो गईं। हम पिताजी को लेकर होटल पर आए, ससुरजी को साथ लिया और कमरे पर पहुँचे तब करीब साढ़े आठ बजे थे। दरअसल हुआ यह था कि आदित्य पिताजी और ससुरजी से शुरू से ही अलग हो गया था। उसे लगा था कि वे पीछे ही चल रहे हैं लेकिन भीड़ में वे अलग हो गए थे। इसके बाद पिताजी और ससुरजी अधकुँवारी में रास्ते से हटकर एक बेँच पर बैठकर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे लेकिन न हम उन्हें देख पाए न वे हमें जबकि हम भी वहीँ आगे कुछ देर बैठे थे। आदित्य सीधे बाणगंगा आए थे और रास्ते से हटकर एक किनारे बैठ कर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे और बैठे बैठे सो गए थे। बाणगंगा के आगे आकर पिताजी और ससुरजी अलग हो गए थे। ससुरजी को लगा कि पिताजी आगे आ गए हैं और पिताजी को लगा कि ससुरजी पीछे ही हैं।
सुबह नौ बजे माँ की गाड़ी थी इसलिए समय बहुत कम बचा था और पैकिँग आदि बहुत काम बचे थे। हम फटाफट क्लोक रूम से सामान लेकर आए, खाना खाया और पैकिँग शुरू की। मैं पैरों में दर्द को कम करने की एक दवाई ले आया जिसे लगाने के बाद थोड़ा आराम मिला। पैकिँग खतम होने तक करीब ग्यारह बज चुके थे।

Sunday, August 28, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 3

दो वर्ष से पाँच वर्ष के बच्चों को संभालना बच्चों के मामले में शायद सबसे कठिन काम है। वे न तो एकदम छोटे बच्चों जैसे हर बात को मानने को तैयार होते हैं न बड़े बच्चों जैसे समझदार होते हैं। हर बात में अत्यंत उत्सुक और हर चीज को स्वयं आजमाने को तैयार! न तो गोद में चलने को तैयार न ज्यादा देर तक पैदल चलने में सक्षम! इन बच्चों की इसी प्रवृत्ति के कारण अत्यंत सावधानी से इनकी देखभाल करनी पड़ती है। इस मामले में हम भी अपवाद नहीं थे। अनुष्का के लिए वैसे तो वैष्णो देवी की यह दूसरी यात्रा थी पर पहली बार वह सिर्फ सात माह की थी। उस समय का एक अलग अनुभव है जिसे अलग लिखना ही उचित होगा। इस बार की स्थिति बिलकुल अलग थी। भीड़ में बच्चों के गुम होने का अंदेशा रहता है। पैदल चलते समय ठोकर खा कर चोटिल होने की संभावनाएँ रहती हैं। यात्रा के दौरान बार बार वातावरण बदलने से भी उनके बीमार पड़ने की संभावना रहती है। खान पान की एक तो फर्माईशेँ और नियंत्रण करना भी जरूरी होता है। सब मिला कर काफी सावधानी रखनी पड़ती है और कार्य काफी कठिन है। अनुष्का के लिए पिठ्ठू हम दो लोग थे- मैं और मेरे छोटे भाई आदित्य। सामान हमने सिर्फ जरूरत का ही साथ लिया था लेकिन बारिश को देखते हुए अतिरिक्त कपड़े रखना आवश्यक था और इस वजह से भार भी बढ़ना ही था। उसे हम सब ने मिलकर बाँट लिया था लेकिन उसका भी एक बड़ा भाग हमारे ही पास था। आपको एक और बात बता दूँ- कटरा से आगे बढ़ने से पहले श्राईन बोर्ड के कार्यालय से एक यात्रा पर्ची लेना आवश्यक है। यह एक तरह से पंजीकरण है जिससे यात्रियों का हिसाब रखना संभव हो पाता है। इसके लिए दल का कोई भी एक सदस्य जा कर अपने दल का विवरण बता कर पर्ची ले सकता है। यह पर्ची साथ रखना आवश्यक है। कटरा से भवन तक के करीब चौदह किलोमीटर के दौरान कई चेक पोस्ट हैं जहाँ सभी यात्रियों की उनके सामान के साथ तलाशी होती है। यह यात्रियों की सुरक्षा के जरूरी भी है। मुख्य प्रवेश द्वार के बाद बाणगंगा पहला चेक पोस्ट है। यह करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है। यात्रा पर्ची लेने के बाद छः घंटे के भीतर इस चेक पोस्ट को पार करना यात्रियों के लिए आवश्यक है।
यात्रा में शुरू के तीन चार किलोमीटर थोड़े ज्यादा थकाने वाले होते हैं उसके बाद शरीर अपने को अनुकूलित कर लेता है। मुझे प्रसन्नता होती है अपने माँ पिताजी के स्वास्थ्य को देखकर। मेरे पिताजी की आयु अभी 68 वर्ष है जबकि माँ की आयु 62 वर्ष है लेकिन वे अपने बगल में चलने वाले कई युवाओं के लिए भी मिसाल थे। वैसे वे भी अपवाद नहीं थे- आपको अनेकोँ बुजुर्ग व्यक्ति मिल जाएँगे। करीब छः किलोमीटर आगे अधकुँवारी का मंदिर है। यह एक गुफा में है। यदि आपको यहाँ दर्शन करने हैं तो वहीँ काउंटर से एक और पर्ची लेनी होती है जिस पर आपका समूह क्रमांक लिखा होता है जिसके अनुसार आपको गुफा में प्रवेश की अनुमति मिलती है। एक समूह में पचास लोग होते हैं। यदि आपके पास समय कम है तो आप सीधे माता के भवन की तरफ आगे बढ़ सकते हैं। हमारे दल में बच्चे और बुजुर्ग होने की वजह से हमने भी आगे बढ़ने का ही फैसला किया। दरअसल हमें समूह संख्या 267 मिली थी जबकि अभी 145वें समूह की बारी थी जो शाम आठ बजे प्रवेश करने वाला था। इसका अर्थ यह था कि हमें अपनी बारी के लिए शायद रात भर खुले आसमान के नीचे बैठना पड़ता। यात्रा का दूसरा सबसे कठिन भाग अंतिम तीन चार किलोमीटर का होता है। तब तक अधिकांश लोग थक चुके होते हैं और साथ ही मानसिक रूप से भी पहुँचने की जल्दबाजी होती है। इस भाग में चढ़ाई भी थोड़ी कठिन है। शायद इसी बात को अनुभव करके इस भाग में पहले हर आधे किलोमीटर पर हर फिर ढाई सौ मीटर पर संकेतक लगे हैं जो यात्रियों को हिम्मत देते हैं। हम करीब रात के साढ़े दस बजे ऊपर पहुँचे- करीब नौ घंटे में! कई लोग यहाँ पहुँचने के बाद सीधे दर्शन के लिए चले जाते हैं। लेकिन हमने रात में ठहरने का फैसला किया। यात्रियों की सुविधा के लिए ट्रस्ट की तरफ से कम्बल दिए जाते हैं। इसके लिए कई स्टोर बनाए गए हैं जहाँ आप यात्रा पर्ची दिखाकर प्रति कम्बल सौ रुपए की अमानत राशि देकर अपनी जरूरत के अनुसार कम्बल ले सकते हैं। कम्बल वापस करने पर आपके पैसे वापस मिल जाते हैं। भीड़ होने की वजह से किसी छत के नीचे जगह मिलनी मुश्किल थी। रास्ते ही ऐसी खाली जगह बचे थे जिनके ऊपर छत थी। सो हमने भी अन्य लोगों की तरह रास्ते के किनारे ही कम्बल बिछा दिया। करीब तीन बजे सुबह हम उठे और शौचादि करके स्नान किया। करीब एक घंटे में हम तैयार हो गए। अपने कम्बल जमा कर दिए। यहाँ भी दर्शन के लिए समूह संख्या लेना आवश्यक है। दर्शन के लिए जाते समय कैमरा, पर्स, बेल्ट, पेन, थैले, किसी तरह की खाने पीने की कोई चीज, चप्पल आदि कुछ भी साथ ले जाना सख्त मना है। इन सब चीजों को सुरक्षित रखने हेतु यहाँ कई निःशुल्क क्लोक रूम बनाए गए हैं जिनका उपयोग आप कर सकते हैं। हम बिल्कुल ठीक समय पंक्ति में लग गए। दरअसल इस समय भीड़ कम होती है इस समय सीधे यहाँ पहुँचने वाले कम होते हैं और जो पहले पहुँच चुके होते हैं वे अलसा कर आराम कर रहे होते हैं। हमने निश्चिँत होकर ब्रह्म मुहुर्त में माताजी के दर्शन किए। इसके बाद सुविधा अनुसार दान आदि किया। नाश्ता किया। चाय पी। इसके बाद अगले गंतव्य की ओर निकले- भैरव नाथ के मंदिर के लिए। यह मंदिर माता के मंदिर से करीब ढाई किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसी मान्यता है कि माता के दर्शन के बाद भैरव नाथ के दर्शन करने पर ही माता का दर्शन सफल होता है। यह थोड़ा कठिन है क्योंकि चढ़ाई कठिन है और यात्री थके होते हैं। माँ काफी थक गईं थी इसलिए हमने उनके लिए एक खच्चर कर लिया। यहाँ थोड़ी परेशानी है- खच्चर वाले मनमाना किराया माँगते हैं। हालाँकि इसके लिए कई काउंटर बने हैं लेकिन उनका कोई लाभ नहीं है। खैर हमने भैरव नाथ के दर्शन किए। इसके बाद हमने वहीँ बने जलपान गृह में अपनी पसंद के अनुसार खाना खाया और नीचे उतरना शुरू किया। इसके लिए पुनः भवन आने की जरूरत नहीं है। वहीँ से रास्ता है।

Monday, August 22, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 2






हरिद्वार से जम्मू के लिए हम कुल सात लोग थे- छः बड़े और एक अनुष्का। शाम के करीब साढ़े पाँच बजे गाड़ी आई। आधे घंटे के अपने विराम के बाद गाड़ी चली। हम कुछ देर तक हरिद्वार को पीछे छूटते हुए देखते रहे उसके बाद खाने पीने का कार्यक्रम शुरू हुआ, हाँ पीने में सिर्फ पानी का ही प्रावधान था। भोजन का कार्यक्रम जल्दी इसलिए शुरू करना पड़ा क्योंकि हम जम्मू सुबह पाँच बजे पहुँचने वाले थे इसलिए उससे पहले नींद पूरी होना जरूरी था। थके थे इसलिए जब नींद खुली तो गाड़ी जम्मू स्टेशन पहुँचने वाली थी। हरिद्वार से जम्मू के लिए यह एक ही सीधी गाड़ी है- हेमकुंत एक्सप्रेस। इस गाड़ी का समय थोड़ा असुविधाजनक है- हरिद्वार में भी और जम्मू में भी। सुबह जब गाड़ी जम्मू पहुँची तो सब शौचादि जैसे नित्य क्रियाओं के बेचैन दिखाई दे रहे थे लेकिन सुबह पाँच बजे हम शौचालय कहाँ खोजेँ? मजबूर होकर लोगों को स्टेशन पर खड़ी गाड़ी में ही अपना काम निपटाना पड़ा। हमने भी लोगों का अनुसरण किया। जम्मू आने का उद्देश्य था माँ वैष्णो देवी के दर्शन करना लेकिन उससे पहले स्नान आदि करने जैसे जरूरी काम निपटाने थे। जम्मू स्टेशन के ठीक बाहर दाहिनी ओर श्री माँ वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड का 'वैष्णवी धाम' है जहाँ दर्शनार्थियोँ के ठहरने की व्यवस्था है। हम सबसे पहले वहीँ पहुँचे लेकिन हमें निराशा ही मिली। वहीँ चेक इन और चेक आउट समय सुबह नौ बजे है। मुझे यह समझ में नहीं आया कि देश के कोने कोने से आने वाले भक्त इस समय का ध्यान कैसे रख पाएँगे। और ऐसे में यह व्यवस्था उनकी सहायता और बीचौलियोँ से बचाव कैसे कर रही है। आखिर हमने सीधे कटरा जाने का निर्णय किया लेकिन सामान के जाने का एक ही रास्ता है- टैक्सी बुक करें। सो हमने किया। एक और बात- यदि आप टैक्सी स्टैंड जाएँगे तो पाँच आदमी के कम से कम साढ़े आठ सौ रुपए खर्च करने पड़ेंगे लेकिन बाहर से यही टैक्सी छः सौ रुपए में भी मिल जाएगी। किसी धोखा की संभावना नहीं है। हमने भी किया। रास्ते में ही जबरदस्त बारिश शुरू हो गई। ड्राइवर ने बताया कि पिछले तीन दिनों से भू स्खलन के कारण रास्ता बंद था, एक दिन पहले ही शुरू हुआ है। हम कटरा पहुँचे तो बारिश जारी थी। हमें मजबूर हो कर महँगे कमरे किराए पर लेने पड़े। नहा धोकर हमने खाना खाया। एक घंटे आराम किया। फिर हम निकलने को तैयार हुए- बारिश में ही। एक अच्छी बात यह है कि कटरा में खास बरसाती मिलते हैं जिन्हें पहन कर आप भीगे बगैर जा सकते हैं। कीमत सिर्फ दस रुपए। इसके अलावा एक सुविधा और भी है- आप होटल से चेक आउट करने के बाद भी उनके क्लोक रूम में अपना सामान रख सकते हैं, निःशुल्क। तो करीब दो बजे हम निकल पड़े माता के भवन की तरफ। यह करीब चौदह या पंद्रह किलोमीटर की यात्रा है। इसे आप अपनी सुविधानुसार पैदल या खच्चर की सहायता से पूरा कर सकते हैं। इसके अलावा पालकी और हैलीकॉप्टर की सुविधा भी है। लेकिन कीमत ज्यादा है कम से कम मेरे लिए। हमारे दल में तीन बुजुर्ग थे और एक बच्ची थी। तीन मझले आकार के थैले भी थे। लेकिन दल में उत्साह पूरा था इसलिए कोई परेशानी नहीं थी। हम पहले कुछ देर तेजी से फिर धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे। जगह जगह जलपान आदि की सुविधा है। सुस्ताने के लिए बेँच लगी हैं। शौचालय आदि भी हैं। बारिश भी जैसे सिर्फ हमारी परीक्षा के लिए ही आई हो। जैसे ही हम होटल से निकले, थोड़ी देर बाद ही बंद हो गई।

Sunday, August 21, 2011

हमारी हरिद्वार और जम्मू की यात्रा- 1







पिछले कई महीनों से हम योजना बना रहे थे- मेरी बेटी के मुंडन संस्कार की। पहले यह फरवरी, 11 में ही होना था पर मेरे भाई की शादी की वजह से नहीं हो पाया। उसके बाद हमने अक्तूबर का कार्यक्रम बनाया- दशहरे के ठीक बाद का। इसका एक कारण तो यह था कि मुंडन हरिद्वार में शांतिकुंज में होना था, सो दशहरे की छुट्टियां काम में आ जातीं और दूसरा स्कूलों में छमाही इम्तहान होने से गाड़ियों में और पर्यटन स्थलों पर भीड़ कम होती है जिससे वाजिब कीमतों में उचित व्यवस्था हो जाती है। इस विचार के साथ हमने गाड़ियों (रेल) के टिकट भी बुक कर लिए। लेकिन यह दूसरा कारण ही हमारे सामने दूसरे रूप में अड़चन बन गया। मेरे छोटे भाई साहब जो पुणे में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं उनके इम्तहान भी अक्तूबर में ही पड़ गए और मैं उन्हें छोड़कर यह कार्यक्रम करना नहीं चाहता था। अब हमारे सामने दो विकल्प थे- एक, या तो कार्यक्रम भादो (भाद्रपद) शुरू होने से पहले निपटा लें या दूसरा, इसे फरवरी तक टाला जाए क्योंकि अक्तूबर के बाद ठंढ बढ़ने लगती है। बात यही तय हुई कि टालने की बजाए अगस्त में ही निपट लिया जाए। यह सारा निर्णय जुलाई के पहले हफ्ते हुआ। समय बहुत कम था और तैयारियाँ काफी करनी थी। कुल मिलाकर पंद्रह से बीस लोगों को लेकर हरिद्वार की सैर करनी थी। हमारे उत्तर प्रदेश और बिहार की रिश्तेदारी भी काफी कठिन हो गई है। किसी को न बुलाओ तो समस्या और बुलाओ तो समस्या! कोई पुणे से, कोई बोकारो से, कोई दिल्ली से, कोई गुडगाँव से और कोई बलिया से! सबके टिकट बुक कराओ, उन्हें स्टेशन पर लेने जाओ आदि आदि। अपनी तैयारी अलग से। कार्यक्रम में एक और विस्तार यह हुआ कि रिश्तेदारोँ को विदा करने के बाद जम्मू, माँ वैष्णो देवी के दर्शन का निर्णय हुआ।
खैर आठ अगस्त को मैं, मेरी श्रीमतीजी, पिताजी, मेरे ससुरजी, मेरी सालीसाहिबा और साथ में अनुष्का- मेरी ढाई वर्ष की बेटी पटना से हरिद्वार के लिए निकले। बाकी लोगों के टिकट उनकी सुविधा के अनुसार उनके पास भेज दिए गए थे और वे सीधे हरिद्वार पहुँचने वाले थे। हमारी गाड़ी रात के नौ बजे थी। हम समय से स्टेशन पहुँच गए थे। स्टेशन का नाम मतलब भीड़ और शोर। उस पर गाड़ी एक घंटे देर से आ रही थी। हम इंतजार के अलावा कर भी क्या सकते थे? आखिर जब गाड़ी आई तो वह लगभग ढाई घंटे देर से चल रही थी और रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। लेकिन अभी तो शुरुआत हुई थी। सावन का महीना था और भोलेनाथ के दर्शन को निकले काँवड़ियोँ की भीड़ गाड़ी में भरी थी और वे सारी खाली सीटों पर कब्जा जमाए थे। उनसे सीट खाली कराना रात में एक कठिन काम साबित हुआ। कोई टिकट चेकर नहीं! पाँच में से चार सीटें तो उन्होंने खाली कर दीं- बुजुर्गों और महिलाओं का खयाल करके। इसके लिए मैं उनको धन्यवाद देना चाहूँगा। लेकिन मेरी सीट मुझे शेयर करनी पड़ी- मुगलसराय तक, लगभग तीन घंटे। बनारस में वे उतर गए। सुबह हमें ध्यान आया कि गाड़ी में रसोई यान (पैँट्री कार) नहीं है। गाड़ी सुपरफास्ट, रुकने का नाम नहीं ले रही थी। नाश्ता और खाना तो हमारे पास था लेकिन पानी के लिए क्या करें? भारतीय रेल का नियम- गाड़ी का स्टॉप नहीं है लेकिन गाड़ी रुकेगी- या तो स्टेशन के पहले या स्टेशन पर प्लेटफार्मोँ के बीच मेन लाइन पर लेकिन प्लेटफार्म पर नहीं। आखिर लखनऊ में हमने पानी लिया और नाश्ता किया। गाड़ी का हरिद्वार में समय शाम सवा चार बजे था लेकिन तीन घंटे विलम्ब के अनुसार हमने सात बजे के लगभग पहुँचने का अनुमान लगाया था अर्थात वो शाम बेकार! लेकिन भला हो रेल्वे का, गाड़ी ने पूरा समय कवर करते हुए हमें बिल्कुल ठीक समय पर हरिद्वार पहुँचा दिया। काफी दिन बाद सब एक दूसरे से मिले। काफी उत्साह का माहौल रहा। हमारी परंपराओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सबका मिलना हो जाता है वरना आज के व्यस्त और नौकरीपेशा जीवन में कहाँ मिलना हो पाता है। खैर सब पहुँच गए थे और बातें करते हुए सब तैयार हुए और हम गंगाजी की आरती देखने हर की पौड़ी पहुँचे। लौट कर बस एक ही चीज जरूरी थी- खाना खाओ और बिस्तर पकड़ो। आखिर सब थके हुए थे। हम एक ट्रस्ट के आश्रम में रुके थे। लक्जरी होटल नहीं लेकिन काफी अच्छी सुविधा थी। लंगर के रूप में खाने के स्वाद का तो कहना ही क्या! अगले दिन सुबह मुंडन था। वैसे तो मुंडन का समय दस बजे से था लेकिन हम शांतिकुंज सुबह छः बजे ही पहुँच गए। वहाँ सामूहिक यज्ञ में सम्मिलित हुए। लगभग पच्चासी वर्ष से जल रहे अखंड दीपक के दर्शन किए। सबने नाश्ता वगैरह किया। उसके बाद हम हिमालय के मंदिर गए। ध्यान के लिए एक काफी अच्छी जगह है। दरअसल शांतिकुंज अखिल विश्व गायत्री परिवार का मुख्यालय है और साथ ही एक तीर्थ भी। हिंदू धर्म का एक जीता जागता रूप है। यहाँ वैज्ञानिक व्याख्या के साथ सारे संस्कार विधिवत कराए जाते हैं। करीब बारह बजे तक अनुष्का का मुंडन हो गया। उसके बाद हम गंगा पूजन के लिए पांडव घाट पहुँचे। हरिद्वार में गंगाजी की धार पटना के मुकाबले काफी ज्यादा रहती है, बारिश की वजह से यह और ज्यादा हो गई थी। हमने सावधानी से स्नान किया और पूजन किया। बारिश रुक रुक कर आ रही थी। उसी दिन शाम को कई लोगों को वापस निकलना था सो हम ज्यादा समय बर्बाद किए बिना वापस अपने कमरे में चले आए। अगले दिन हम बजे हुए लोग घूमने निकले। ऋषिकेश में राम झूला और लक्ष्मण झूला देखा लेकिन सबसे अच्छा प्राकृतिक सौंदर्य लगा जो दूर दूर तक दिखाई दे रहा था। बंदर तो मत पूछिए जहाँ देखो वहीँ। उसी दिन शाम को जम्मू के लिए हमारी गाड़ी थी सो लौटते हुए हम सामान लेकर सीधे स्टेशन पहुँच गए। गाड़ी फिर पौन घंटा देरी से!






Friday, August 5, 2011

भ्रष्टाचार की जड़ें- 2

ये घटना मेरे स्कूली शिक्षा के समय की है। हम सहपाठियोँ में कई मेरे गाँव के ही थे। हममें से कई वैसे तो अलग अलग स्कूलों में पढ़ते थे लेकिन स्कूल से लौटने के बाद साथ ही एक साथ ही खेलते थे।
उन दिनों हमारे गाँवों में सहकारी दुकानें थीं जिन्हें गाँव के लोग 'कोऑपरेटिव' भी कहते थे। इस दुकान से गाँववासियोँ को सस्ते दरों पर कपड़ा, शक्कर आदि मिलता था। मुझे याद है पिताजी हम दो भाइयों के लिए हमारे गाँव की दुकान से कपड़ा लाए थे जो काफी टिकाऊ था। हम सहपाठियोँ में से एक के पिताजी उस दुकान पर कार्यरत थे। इलाके के एक प्रभावशाली श्रीमंत के के यहाँ शादी थी सो उनके अतिथियों के सत्कार के लिए बनने वाले भोजन के लिए काफी मात्रा में शक्कर की आवश्यकता थी। मैं सिर्फ शक्कर की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि इसके अलावा उस दुकान में उनकी हैसियत के अनुसार और कुछ नहीं था। उनके वफादार चमचे (माफ करिएगा) अधिकारी ने गाँव के हिस्से की शक्कर उन श्रीमंत के हवाले कर देने का आदेश दे दिया। किंतु मेरे मित्र के पिताजी जो उस समय उस दुकान पर थे, ऐसा करने से मना कर दिया। किंतु उनकी ये ईमानदारी उनके लिए काफी महँगी पड़ी। दूसरे दिन उस दुकान पर औचक निरीक्षण हुआ! काफी बड़ी मात्रा में हेराफेरी पाई गई! उन्हें निलम्बित कर दिया गया और जाँच के आदेश दे दिए गए। काफी गहरा सदमा पहुँचा उन्हें। उनका वेतन उनके आमदनी का बड़ा हिस्सा था जो अब बंद हो चुका था। घर में तीन बच्चे बड़े हो रहे थे। उनका खर्च बढ़ रहा था। जाँच चल रही थी और उन्होंने अदालत की शरण भी ली। किंतु सदमे की मार और जिंदगी की लड़ाई ने उन्हें ज्यादा दिन जीने नहीं दिया। कहते हैं शौच के समय आदमी सबसे गहराई से सोचता है, शौच करते समय ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसे। परिवार पर तो पहले जैसे मुसीबतोँ का पहाड़ टूट पड़ा। घर के खर्च जुटाएँ या अदालत का। उत्तर प्रदेश और बिहार में लड़की की शादी भी एक मुसीबत ही कही जा सकती है। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। उन्हें घर के खर्च के लिए पहले खेतों में काम करना पड़ा। आखिर मुकदमे में मेरे मित्र की जीत हुई किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पढ़ाई बीच में छूट जाने के बाद उन्हें पंजाब जा कर मजदूरी करनी पड़ी। हमारे सहपाठियोँ में आज एक भी बेरोजगार नहीं है किंतु इस हादसे ने दो होनहार बच्चों को जबरन मजदूर बना दिया। मुझे खुशी है कि आज मेरे मित्र अपने मेहनत से अपनी गाड़ी फिर से लाइन पर ला पाए हैं। मेरे सहपाठी मित्र आज हीरो साइकिल में कार्यरत हैं।
ये एक सच्ची घटना है जिसने हमारे युवा होते मन पर गहरा प्रभाव डाला।

Thursday, August 4, 2011

सरकार के बजाए अपनी सुध लें

बिहार में और विशेषतः पटना में लोग अपनी जिम्मेदारियाँ जाने बगैर हर बात के लिए सरकार को दोष देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यदि मेट्रो से पटना की तुलना करना चाहते हैं तो नागरिक उत्तरदायित्वोँ को जानना एवं सीखना होगा। क्या हमने कोनोँ में थूकना बंद किया है? नहीं। क्या हमने सार्वजनिक जगहों को पेशाबघर समझना बंद किया है? नहीं। क्या हमने ऐसा करने वालों को टोकना शुरू किया है, नहीं। हम सड़क पर, घर के पीछे और हर ऐसी खाली जगह पर जहाँ कोई देख न रहा हो, कचरा फैलाते हैं और सफाई की बात करते हैं। पानी को बचाना नहीं जानते और पानी की कमी का रोना रोते हैं। राजधानी में रह कर भी बिजली चोरी को अपना अधिकार मानते हैं फिर बिजली के लिए सरकार को दोष देते हैं। महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में भी जो बिजली उत्पादन में देश में अव्वल है, शून्य विद्युत कटौती उन्हीं शहरों को मिल रही है जिनका बिल भुगतान का औसत शत प्रतिशत या उसके बहुत करीब है। हमलोग मुम्बई, चेन्नई, बंगलोर, हैदराबाद आदि शहरों में जाते हैं लेकिन क्या हम पंक्ति में रहकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करना सीख पाए हैं? नहीं, लेकिन हम व्यवस्था की बात करते हैं। सरकार को जितना करना चाहिए उससे अधिक कर रही है। अब यदि हम बिहार को विकसित देखना चाहते हैं तो जरूरी है कि हम अपने हिस्से का योगदान शुरू करें। 'अधिकारों का वह हकदार जिसको कर्तव्यों का ज्ञान'। और यदि नहीं तो जितना जी चाहे चिल्लाते रहो, जुगाड़ लगा कर लाइन के बाहर से अपना काम कराते रहो, आठ- दस घंटों की बिजली में इन्वर्टर की बैटरी चार्ज करते रहो, 'साइड इंकम' से अपना बैंक बैलेँस बढ़ाते रहो, दहेज देते और लेते रहो। राज और उद्धव ठाकरे जैसे लोगों को बिहार को बदनाम करते रहने दो- आपको क्या अंतर पड़ता है? लेकिन सड़क, बिजली, सफाई और व्यवस्था की बात कृपया मत करो।

Tuesday, August 2, 2011

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती...

"लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फ..."

Thursday, July 28, 2011

दो बच्चों का कानून

बिहार में रेहाना की बर्खास्तगी का मामला उम्मीद के अनुसार ही एक विवाद का स्वरूप
लेता जा रहा है। ये विवाद हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों की कुंठित मानसिक
स्थिति को इंगित करते हैं। देश हित में बनाए गए एक सर्वथा आवश्यक कानून
को जन विरोधी बता कर अपनी गलतियों को अपने फायदे के लिए सही साबित करना
अब इन राजनीतिक लोगों का हथकंडा बन चुका है। अतः इसमें जुटे लोगों में
क्षेत्रीय राजनीतिक लोगों को देखकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। रेहाना जैसे
लोगों के साथ इनको साथ देने वाले लोगों को भी जनहित व देशहित विरोधी
भावनाएँ भड़काने के आरोप में सरकारी दायित्वों से मुक्त कर देना चाहिए और
भविष्य में भी चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। यदि ऐसा कानून
नहीं है तो उसे बनाया जाना चाहिए। इस मुद्दे को धर्म से जोड़कर बच्चों को
भगवान का आशीर्वाद या अल्लाह की नेमत बताने वाले लोग ऐसे हजारों बच्चों की
सुध क्यों नहीं लेते जो अपने माँ बाप की गलतियों से सड़कों, रेलवे
स्टेशनों और ऐसे अन्य जगहों पर भीख माँगते हैं, उन बच्चों की सुध क्यों
नहीं लेते जो अपना बचपन भी पूरा नहीं कर पाते। क्या अल्लाह के नेमत की
उनके लिए इतनी ही कीमत है? इंसान की गलतियों को भगवान या अल्लाह पर थोपना
उचित नहीं है। ईश्वर ने इंसान को बुद्धि दी है ताकि वो अपना फायदा नुकसान
समझ सके और अपने कर्मों के लिए इंसान खुद ही जिम्मेदार है ईश्वर या
अल्लाह नहीं। आज परिवार नियोजन के कई साधन उपलब्ध हैं। इनमें से जो अपने
और अपने धर्म की मान्यताओं के अनुकूल लगे उन्हें उपयोग करना चाहिए और यदि
ऐसा नहीं करना है तो खुद पर संयम रखना सीखना चाहिए। अपनी जरूरतों को पूरा
करते हुए देश एवं समाज का ध्यान रखना भी जरूरी है। जो मान्यताएँ समय के
हिसाब से बदलती नहीं हैं वे बिखर जाती हैं और अपने मानने वाले को भी
तकलीफ पहुँचाती हैं। आज के समय में हमारे देश में आबादी का विकराल स्वरूप
हमारे विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है। इसे नियंत्रित करने का एकमात्र कारगर
तरीका परिवार नियोजन है और हमें इस तथ्य को समझना ही होगा। इसे बढ़ावा
देने के लिए कड़े कानून भी होने ही चाहिए और इसमें किसी धर्म या मान्यता
का कोई सरोकार नहीं है। रेहाना को अपने निजी फायदे से ऊपर उठकर कार्य
करना
चाहिए। उसे अपनी गलतियों को समझते हुए अन्य लोगों को भी परिवार नियोजन के
लिए प्रेरित करना चाहिए। इससे देश के साथ मुस्लिम समाज में भी एक
सकारात्मक मिसाल बनेगी। यदि वह सच में समाज सेवा करने को उत्सुक हैं तो
उन्हें ऐसा करना ही होगा, आगे उनकी मर्जी।

Monday, July 18, 2011

भ्रष्टाचार की जड़ें- 1- 1

पटना जैसे शहरों में बिजली की चोरी जोरों से चल रही है। लोग अपने घरों में बाकायदा चेँजओवर स्विच लगाए हुए हैं जिनसे वे रात में, मोटर वगैरह चलाते समय या फिर महीने में कुछ दिनों के लिए बिजली के मीटर को बायपास कर अपनी मर्जी के बिजली बिल में मनमानी बिजली उपयोग करते हैं। हद यह है ज्यादातर लोगों ने किराएदार रखे हैं जिनके लिए सब-मीटर लगे हैं और किराएदारोँ से बिजली बिल के नाम पर मोटी रकम भी वसूली जा रही है, अर्थात दोनों तरफ से फायदा। किराएदारोँ की कोई पक्की जानकारी नहीं ली जाती है न ही पुलिस में उनके बारे में कोई जानकारी दी जाती है जिससे शहरों में आपराधिक घटनाओं पर रोक लगा पाना असंभव होता जा रहा है। एक और बात- किराएदारोँ से मिलने वाली रकम के एवज में कोई रसीद नहीं दी जाती, माँगने पर भी नहीं- रहना है तो रहो नहीं तो कहीं और देखो! नौकरीपेशा किराएदार तो नकली रसीद जमा कर के अपने लिए टैक्स की छूट प्राप्त कर लेते हैं जबकि मकान मालिक भी अपनी आय को छिपा कर सरकारी खजाने को दोगुना चुना लगाते हैं।

Sunday, July 17, 2011

बेटी की मुंडन

दो वर्ष बाद कहीं घूमने का मौका मिल पा रहा है। दरअसल मेरी बेटी का मुंडन संस्कार हम हरिद्वार में करने जा रहे हैं तो हरिद्वार, ऋषिकेश के साथ जम्मू में वैष्णो देवी के दर्शन का भी कार्यक्रम बन गया है। उम्मीद है मजा आएगा।

आत्म निर्माण सत्संकल्प

1. हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेँगे।
2. शरीर को भगवान का मंदिर समझकर आत्म- संयम और नियमितता द्वारा अयोग्य की रक्षा करेंगे।
3. मन को कुविचारोँ और दुर्भावनाओँ से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था बनाए रखेंगे।
4. इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।
5. अपने आपको समाज का एक अंग मानेँगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।
6. मर्यादाओँ को पालेँगे, वर्जनाओँ से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।
7. समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेँगे।
8. चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।
9. अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।
10. मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओँ एवं विभूतियोँ को नहीं, उसके सद्‌विचारोँ और सत्कर्मोँ को मानेँगे।
11. दूसरों के साथ वह व्यवहार नहीं करेंगे जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।
12. नर- नारी आपस में पवित्र दृष्टि रखेंगे।
13. संसार में सत्प्रवृत्तियोँ के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।
14. परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्व देंगे।
15. सज्जनोँ को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नव- सृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।
16. राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, संप्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव नहीं करेंगे।
17. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा
18. हम बदलेँगे- युग बदलेगा, हम सुधरेँगे- युग सुधरेगा, इस तथ्य पर हमारा पूर्ण विश्वास है।

Saturday, April 16, 2011

कायाकल्प का मर्म और दर्शन- 2

पिछली कड़ी से आगे..

जिस दिन आपको यह बोध हो जाएगा कि हम जीवात्मा हैं, शरीर नहीं, उसी दिन आपका मौत का भय निकल जाएगा और योजनाएँ ऐसी बनेंगी जो आपके जन्म- जन्मांतर की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ होंगी। आज तो आप छोटे आदमी हैं, और छोटी समस्याओं में उलझे रहते हैं। पेट कैसे भरेगा? कपड़ा कहाँ से मिलेगा? मकान का किराया कैसे चुकाएँगे? लड़कियों की शादी कैसे होगी? नौकरी में तरक्की कैसे होगी? आदि, आदि। लेकिन कभी आप अमर हो गए तब? तब आप अमर लोगों की तरह विचार करेंगे और यह सोचेंगे कि अपने उत्थान के साथ- साथ सारे विश्व का उत्थान करने के लिए क्या करना चाहिए और कैसा बनना चाहिए।

कायाकल्प शरीर का नहीं हो सकता, प्रकृति का हो सकता है। प्रकृति ही बदल सकती है आदमी की। आकृति? आकृति नहीं बदल सकती। आकृतियाँ नहीं बदल सकतीं आदमी की, प्रकृति बदल सकती है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी के बारे में रामायण में कहा है। तीर्थराज त्रिवेणी का महात्म्य बताते हुए उन्होंनें कहा है कि कौआ कोयल हो जाता है, बगुला हँस हो जाता है। कौआ और कोयल एक जैसे दिखाई देते हैं लेकिन उनकी प्रकृति में अंतर है। हँस और बगुला दोनों एक जैसे दिखाई देते हैं लेकिन उनकी प्रकृति में अंतर है। फिर कौआ कोयल और बगुला हँस कैसे हो जाते हैं। यहाँ प्रकृति बदलने की बात है, शरीर बदलने की नहीं।

यह कायाकल्प है। आपको यहाँ अपना कायाकल्प करने की तैयारी करनी चाहिए। शरीर कल्प नहीं, मनः कल्प। मनः कल्प कैसे करें? इस तरह करें कि आपका क्षुद्रता का दायरा महानता के दायरे में बदल जाए। आपका दायरा बहुत छोटा है। एक छोटे से दायरे में आपने अपने आप को सीमित किया हुआ है। अब आप असीम बन जाइए। आप सीमित रहने से इंकार कर दीजिए। आप पिंजड़े के पंछी की तरह जिंदगी मत बिताइए। आप उड़ने की तैयारी कीजिए। कितना बड़ा आकाश है, इसमें स्वच्छन्द विचरण करने के लिए उमंगें जगाइए और पिंजड़े की कारा में रहने से इंकार कर दीजिए। आपको लगता है कि आप पिंजड़े की दीवारों में सुरक्षित हैं, यहाँ हमको चारा, दाना मिल जाता है; लेकिन कभी आपने खुली हवा में साँस ली है और आपने अपने पंखों के सहारे आसमान में उड़ने का आनंद लिया है? अब आप ऐसा करने की कोशिश कीजिए। अपने आप को बंधन मुक्त करने की कोशिश कीजिए। आप भव- बंधनों में जकड़े हुए आदमी मत रहिए। आप मुक्त इंसान की तरह विचार कीजिए। आप नर से नारायण बनने की महत्वाकांक्षा तैयार कीजिए। आप उसी क्षुद्र महत्वाकांक्षा में उलझे रहेंगे क्या? कौन सी? लोकेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेषणा। नहीं, आप कुछ और बड़ी महत्वाकांक्षा को लाइए। आप पुरुष से पुरुषोत्तम बनिए, आप नर से नारायण बनने पर विचार कीजिए। आप कामनाओँ की आग में जलने की अपेक्षा भावनाओं के स्वर्ग और शांति में प्रवेश कीजिए। कामनाओँ में ही लगे रहेंगे क्या? आप माँगते ही रहेंगे क्या? भिखारी ही बने रहेंगे क्या? नहीं, आप भिखारी बने रहने से इंकार कर दीजिए। अब आप दानी बनिए। जिंदगी भर आपने अपेक्षाएँ की हैं, एक के बाद दूसरी अपेक्षा। गणेशजी हमको यह दे देंगे, साईँ बाबा हमको यह दे देंगे, पत्नी यह देगी, बच्चा यह देगा। आपका सारा जीवन भिखमंगोँ की तरह व्यतीत हो गया। अब आप कृपा कीजिए और अपना रवैया बदल दीजिए। आप यह मान कर चलिए कि आप दान देने में समर्थ हैं और आप देंगे। अपनी धर्मपत्नी को कुछ न कुछ जरूर देंगे आप। उसकी योग्यता कम है, तो योग्यता बढ़ाइए, उसका स्वास्थ्य कमजोर है तो स्वास्थ्य बढ़ाइए। आप उसकी उन्नति का रास्ता नहीं खोलेंगे? उसके सम्मान को नहीं बढ़ाएँगे आप? उसके भविष्य को नहीं बनाएँगे? आप ऐसा कीजिए और फिर देखिए, आप दानी हो जाते हैं कि नहीं। आप भिखारी रहेंगे तो उससे कामवासना की बात करेंगे, उससे मीठी बातों की माँग करेंगे, सहयोग की माँग करेंगे, माँगते ही रहेंगे। फिर आप हैरान होंगे और दूसरों की नजरों में हेय कहलाएँगे। फिर इसका क्या गारंटी है कि माँगी हुई चीज मिल ही जाएगी। गारंटी भी नहीं है फिर क्यों बेवजह पापड़ बेलेँ? आप ऐसा क्यों नहीं कर सकते कि देने की ही बात पर विचार करें। देने में आप पूरी तरह समर्थ हैं। आप सद्भावना दे सकते हैं, सेवा के लिए कहीं न कहीं से समय निकाल सकते हैं।

आप ऐसा कीजिए कि दानी बनिए और याचक का चोला नीचे पटक दीजिए। आप मालिक नहीं माली हो कर रहिए। मालिक होकर रहेंगे तो बहुत हैरान होंगे। यकीन मानिए, मालिक को इतनी हैरानी, इतनी चिंता रहती है जिसका कोई ठिकाना नहीं; लेकिन माली? माली को दिन भर बगीचे में मेहनत करनी पड़ती है और हैरानी का नाम नहीं। क्यों? क्योंकि वह समझता है कि यह बगीचा किसी और है, मालिक का है और हमारा फर्ज है, हमारी ड्यूटी है, कि इस बगीचे को अच्छे से अच्छा रखें। माली सिंचाई करता है, गुड़ाई करता है, निराई करता है, जो कर सकता है करता है। आप सिर्फ अपने फर्ज और कर्तव्य तक अपना रिश्ता रखिए, आप परिणामों पर विचार करना बंद कर दीजिए, क्योंकि परिणामों के बारे में आप कोई गारंटी नहीं दे सकते। आप जैसी परिस्थितियाँ चाहते हैं वे मिल जाएँगी, इसकी कोई गारंटी नहीं। नहीं, हम मेहनत करेंगे। तब भी गारंटी नहीं! आप इम्तहान में पास हो जाएँगे, कोई जरूरी नहीं। आप मेहनती हैं तब भी हो सकता है आप फेल हो जाएँ। आप व्यापार में कुशल हैं फिर भी तब भी संभव है आपको नुकसान हो जाए। आप बहुत चौकस रहते हैं लेकिन फिर भी संभव है आप को बीमारियाँ पकड़ लें, चोर आदि आपका नुकसान कर दें। परिणामों के बारे में आप कुछ नहीं कर सकते। जो परिणाम आपके हाथ में, फिर आप ऐसा क्यों करेंगे कि उनके बारे में इतना लालच करें और अपनी शांति खो बैठें। आप केवल कर्तव्य की बात सोचिए, केवल माली की तरह सोचिए, मालिक की बात खत्म, अधिकार की बात खत्म। कर्तव्य आपके हाथ में हैं, अधिकार दूसरों के हाथ में। आप अधिकार को लौंग मानिए और अपने कर्तव्यों को, जिम्मेदारी को इससे सुगंधित कीजिए।

Monday, April 4, 2011

हमारा नववर्ष

आप सभी को नववर्ष (विक्रम संवत्सर 2068) की हार्दिक शुभकामनाएँ।
विलम्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ।

Sunday, April 3, 2011

हम जीत गए!!!

वाह! क्या रोमांचक क्षण है। एक लंबे अंतराल एवं इंतजार के पश्चात हम क्रिकेट का विश्व कप जीतने में सफल हुए हैं। पहली बार जब भारत ने 1983 में विश्व कप जीता था तब तो मैं काफी छोटा था और उसकी धूमिल सी याद भी नहीं आती है, लेकिन इस बार का रोमांच शायद मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। आप सभी को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाइयाँ।
अभी मेरे पास टेलीविजन नहीं था लेकिन तकनीकी विकास आज इस स्तर पर पहुँच गया है कि आप के पास विकल्प काफी रहते हैं। मुझे भी इसका लाभ मिला। मैंने अपने मोबाइल पर इंटरनेट के विश्व कप के प्रत्येक मैच के एक- एक क्षण को अनुभव किया। पाकिस्तान के साथ हुआ मैच मुझे दो कारणों से विशेष लगा। एक- भारत इस जीत के बाद विश्व कप के फाइनल में पहुँच जाता; और दो- हम कितनी कड़वाहट और द्वेष भरे बैठे हैं अपने दिलों में अपने पड़ोसियों के प्रति। कुछ लोगों का धार्मिक उन्माद, कुछ लोगों का राजनीतिक स्वार्थ किस तरह हम पर हावी हो गया है। काश, सीमा के दोनों तरफ हमें अपने बिछड़े भाइयों की यादें इतना बेचैन कर देतीं कि हम दौड़े चले जाते उनसे गले मिलने और फिर से भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश एक हो जाते। मुझे ऐसा आभास होता है कि ऐसा भविष्य में होने वाला है। मैं आप सभी से इस संभावना पर राय जानना चाहूँगा।
धन्यवाद।

Saturday, April 2, 2011

कायाकल्प का मर्म और दर्शन, भाग- 1

<पूज्यवर की अमृतवाणी (भाग एक), पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय से उध्धरित>

देवियोँ! भाइयों!!
बात कायाकल्प की चल रही थी। आप कल्प की इच्छा के लिए आए हैं न! कल्प में आपके सारे शरीर को बदलना तो संभव नहीं है; पर आपका मन बदल सकता है, आपका स्तर बदल सकता है, आपका भविष्य बदल सकता है। आपका भूतकाल जो कि घिनौना भूतकाल, खाली हाथ वाला भूतकाल, चिंताजनक स्थितियों वाला भूतकाल है, वह ऐसे उज्ज्वल भविष्य में बदल सकता है, जिसकी आपने कभी कल्पना नहीं की होगी। भूतकाल कैसा रहा है? आपको अपनी आँख से कैसा दिखता है? क्या कहूँ मैं आपसे! आपने अपना मकान बना लिया, लड़कों के लिए धन एकत्र कर दिया, लड़कियों की शादी में ढेरों पैसा खर्च कर दिया। अगर आप इन्हीं बातों को अपनी सफलता की निशानी मानते हैं; तो मानते रहिए, मैं कब कहता हूँ कि ये सफलताएँ नहीं हैं; लेकिन मेरी दृष्टि में ये सफलताएँ नहीं हैं। आपकी सफलता रही होती तब जब आप दूसरे नानक रहे होते, कबीर रहे होते, रैदास रहे होते, विवेकानंद रहे होते, गाँधी हो गए होते, तो मैं आपके भूतकाल को शानदार मानता। लेकिन भूतकाल कैसा था? जानवरों का जैसा होता है- पेट भरते रहते हैं और बच्चे पैदा करते रहते हैं। वह भी तो आपका इतिहास है। पिछले दिनों आपने क्या किया? बताइए? एक तो आपने पेट भरा और दूसरे औलाद पैदा की है। औलाद की जिम्मेदारियाँ सर पे आएँगी ही और आपको वहन करना ही पड़ेगा। जब आपने गुनाह किया है तो उसकी सजा भी आपको भुगतनी ही पड़ेगी। आपने बच्चे पैदा किए हैं न, तब सजा भी भुगतिए। सारी जिंदगी भर उनके लिए कमाइए, कोल्हू के बैल की चलिए, पीसिए अपने आपको और उनको खिलाइए; क्योंकि गुनाह तो आपने किया ही है। एक औरत को हैरान किया है न, बेचारी नौ महीने पेट में वजन रखा, कष्ट सहे, छाती का दूध पिलाया, फिर आप क्यों नहीं कष्ट सहेँगे? आप भी कोल्हू में चलिए, आपको भी बीस साल की कैद होती है। बीस साल का बच्चा न हो जाए तब तक आप कैसे पीछा छुड़ा पाएँगे? यही तो भूतकाल है आपका! यही तो आपकी परिणति है। यही तो आपने पुरुषार्थ किया है। कोई ऊँचे स्तर से विचार करेगा तो आपके भूतकाल को कैसे प्रोत्साहित करेगा?

अब आप अपने भविष्य को ऐसा मत बनाइए। भविष्य को आप ऐसा बनाइए कि जब तक आप रहें, तब तक संतोष करते रहें और जब नहीं रहें तो आपके पद चिन्होँ पर चलते हुए दूसरे आदमी भी रास्ता तलाश कर सकें। गाँधीजी ने राजकोट में राजा हरिश्चन्द्र की कहानी देखी और उस छोटे बच्चे गाँधी के मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने उसी दिन फैसला कर लिया कि अगर जिउँगा तो हरिश्चन्द्र हो कर जिउँगा। उज्ज्वल भविष्य और उसके संकल्प ऐसे ही तो होते हैं। संकल्पों से उन्होंने क्या से क्या कर डाला। आपको ऐसे संकल्पों को चरितार्थ करने के लिए यहाँ सहारा भी है। आप कैसे सौभाग्यशाली हैं! आपको तो सहारा भी मिल गया। आमतौर पर लोग अकेले ही चलते हुए मंजिल पार करते हैं, पर आपको तो अकेले चलने के साथ लाठी का सहारा भी है। आप इस सहारे का लाभ क्यों नहीं लेते? आम लोग पैदल सफर करते हैं पर आपके लिए तो सवारी भी तैयार खड़ी है। फिर आप लाभ क्यों नहीं उठाते? शान्तिकुंज* के वातावरण को केवल आप यह मत मानिए कि यहाँ दीवारें ही खड़ी हुईँ हैं, आप यह मत सोचिए कि यहाँ शिक्षण का कुछ क्रम ही चलता रहता है, यह मत सोचिए कि यहाँ कुछ व्यक्ति विशेष ही रहते हैं। आप यह भी मानकर चलिए कि यहाँ एक ऐसा वातावरण आपके पीछे पीछे लगा हुआ है, जो आपकी बेहद सहायता कर सकता है। उस वातावरण से निकली प्राण की कुछ धाराओं को, जिसने खींचकर आपको यहाँ बुलाया है और आप जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, उस वातावरण, प्रेरणा और प्रकाश को चाहें तो आप एक नाम यह भी दे सकते हैं- पारस।

पारस उस चीज का नाम है, जिसे छू कर लोहा भी सोना बन जाता है। आप लोहा रहे हों पहले से, पर इस समय आप सोना बनने की परिस्थितियों में हैं। आप के पास एक पारस है, जिसको आप छुएँ, तो देख सकते हैं कि किस तरह आप की काया बदलती है। आप अभावग्रस्त दुनिया में भले ही रहे हों पहले से, आपको सारी जिंदगी यह कहते रहना पड़ा हो कि हमारे पास कमियाँ बहुत हैं, अभाव बहुत हैं, कठिनाइयाँ बहुत हैं; लेकिन यहाँ एक ऐसा कल्प वृक्ष विद्यमान है जिसका आप सच्चे अर्थों में सहारा लें, तो आपकी कमियाँ, अभावों और कठिनाइयों में से एक भी जिंदा रहने वाली नहीं हैं। कल्प वृक्ष कोई पेड़ होता है या नहीं, मैं नहीं जानता। न मैंने कल्प वृक्ष देखा है और न मैं आपको कल्प वृक्ष के सपने दिखाना चाहता हूँ। लेकिन अध्यात्म के बारे में मैं यकीनन कह सकता हूँ कि यह एक कल्प वृक्ष है। अध्यात्म कर्मकाण्डोँ को नहीं, दर्शन को कहते हैं, चिंतन को कहते हैं। जीवन में परिवर्तन कर सके, ऐसी प्रेरणा और प्रकाश का नाम है अध्यात्म। ऐसा अध्यात्म अगर आपको मिल रहा हो या यहाँ मिल जाए या मिलने की जो संभावनाएँ हैं, उससे आप लाभ उठा लें, तो आप यह कह सकेंगे कि हमको कल्प वृक्ष के नीचे बैठने का मौका मिल गया है।

आपको रोज मरने की चिंता होती है न, मरने वाले प्राणी जिस तरह अपनी हविश को पूरा करने के लिए, अपना पेट भरने के लालायित रहते हैं, आपको वैसा कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। दीर्घजीवियोँ के तरीके से आप हमेशा जिंदा रहेंगे, आपकी कभी मौत नहीं होगी। जो कभी नहीं मरते उन्हें कालजयी कहते हैं। आप भी कालजयी हो सकते हैं- कब? जब आप अमृत पिएँ, तब। शरीर को जिंदा रखने वाला अमृत कभी रहेगा तो दुनिया में प्रकृति के नियम खत्म हो जाएँगे। कौन दिखाई पड़ता है बताइए? भगवान श्रीराम कहीं दिखाई पड़ते हैं? भगवान श्रीकृष्ण कहीं दिखाई पड़ते हैं? हनुमान जी की शक्ल देखी है आपने? जब इतने बड़े बड़े महापुरुष और भगवान के अवतार दुनिया में सशरीर नहीं रहे, तो और कौन रहेगा? अगर अमृत कहीं रहा होता तो इन लोगों ने अवश्य पी लिया होता। पर अध्यात्म एक अमृत है जिसे पीकर, आप अमर हो सकते हैं; एक कल्प वृक्ष है, जिसके नीचे बैठकर आप अपना कायाकल्प कर सकते हैं। यह अध्यात्म ज्ञान है और जिस दिन आपको यह बोध हो जाएगा कि हम...
क्रमशः॥

Sunday, March 27, 2011

जीवन- मृत्यु

दोस्तों यह कविता मुझे एक विद्यालय की पुरानी वार्षिक पत्रिका में मिली और एक छात्र (श्री आशीष कुमार) द्वारा लिखी गई है। यह पत्रिका मुझे कचरे में मिली थी। मुझे अच्छी लगी इसलिए मैं आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। लीजिए...

क्या है जीवन?
रहस्य क्या इसका?
मृत्यु क्या है?
सटीक नहीं कहीं उत्तर दिखता।
कहे कोई चलना जीवन है,
हे मानव! तू चलता जा।
कभी ना रुक तू हारकर,
कर्म पथ पर बढ़ता जा।
प्रेम- गीत है यह जीवन,
गाना तेरा काम है।
तुझे बहुत कुछ है करना,
अभी कहाँ आराम है?
दुःखों का जलधि यह जीवन,
जाने इसमें कितने डूबे।
सिंह सम सच ही वह,
जो इनसे कभी न ऊबे।
गुलाबी गुलाबोँ का गुलदस्ता नहीं,
जीवन इतना सस्ता नहीं।
काँटोँ की ये है माला,
जिसे खुदा ने है संभाला।
कोई कहे सुधा सम यह,
कहे कोई यह विष का प्याला।
जीवन मृत्यु है महिमा रब की,
जिसका है अंदाज निराला।
जन्म जीवन यही देता है,
मृत्यु भी इसकी ही देन।
जो जीवन है एक नदी,
तो जीवन इसका घाट है।
अद्भुत पुस्तक है जीवन,
पढ़ना सबका काम है।
जिंदगी जिंदादिली का नाम है,
यही मेरा पैगाम है॥

ये जिंदगी और ये दुनिया

दोस्तों नमस्कार! ये एक कविता है जो मेरे युवावस्था में कदम रखने के तुरंत बाद दुनिया के लिए मेरी अभिव्यक्ति का एक हिस्सा है! क्या आपका भी?
आइए देखें...

ये जिंदगी ही जब
बचपन में थी-

तो सोचा करती थी,
टटोला करती थी;

ये दुनिया क्या है?
ये दुनिया वाले क्या हैं?

तब ये समझ ना पाई थी-

दुनिया क्या है!
दुनिया वाले क्या हैं!!

धीरे- धीरे ये जिंदगी
कुछ बड़ी हो गई,

और इसकी दो आँखें हो गईं,

तब ये देखा करती थी,
विचारा करती थी;

ये दुनिया बड़ी अलबेली है,
ये दुनिया बड़ी निराली है,

पर तब ये समझ ना पाई थी-

ये दुनिया अलबेली क्यों है?
ये दुनिया निराली क्यों है?

दिन निकलते रहे,
रातेँ गुजरती रहीं,
मौसम आते- जाते रहे,

वक्त ना रुका है,
और ना रुका,

वह अपनी रफ्तार से गुजरता रहा;

और तभी एक दिन पता चला-
ये जिंदगी जवान हो गई!

ये जिंदगी जवान हो गई,
और इस दुनिया के लिए,
खेल का बहुत सुंदर मैदान हो गई!

दुनिया का नया रूप देख कर-
ये जिंदगी अवाक रह गई,

दुनिया ये खेल कर निहाल हो गई!
उसके ठोकरोँ से जैसे-
ये जिंदगी लहू लुहान हो गई;

ये दुनिया खेली बहुत!
ये जिंदगी रूँदी बहुत!!

रूँदने से धूल उड़ी और-
सूर्यास्त के बाद तेजी से,
फैलते अंधकार की तरह,
चारों ओर छा गई,

सूरज तो शायद अभी सर पर ही-
चमक रहा होगा!

हरी भरी जमीन पर जैसे,

अपनी उपस्थिति की एक,
बेहद खौफनाक पहचान छोड़कर,

दुनिया कुछ किनारे खड़ी थी-
जैसे कुछ और पा लेने की चाहत में!

जिंदगी के बंद होते आँखों से
दो आँसू लुढ़क गए,

अंतर्मन से टीस भरी कराह निकल गई,

अर्द्ध निशा के गहरे अँधेरे में,
अब ये समझ पाई थी-

ये दुनिया क्या है!
ये दुनिया वाले क्या हैं!!
ये अलबेली क्यों है!
ये दुनिया निराली क्यों है!!

पर अब भी किसी कोने में-

एक नए सवेरे की आशाएँ,
हिलकोरे भर रही थी!

ओस की शीतल बूँदोँ से भीगकर,

नए सवेरे की चमकीली रोशनी में,

फिर से हरियाली ला देने की उमंगें
अभी बाकी थीं!!

Saturday, March 26, 2011

मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान- 3

मित्रों! भगवान जब प्रसन्न होते हैं तो वह चीज नहीं देते जो आप माँगते हैं। फिर क्या चीज देते हैं? वह चीज देते हैं जिससे आदमी अपने बलबूते पर खड़ा हो जाता है और चारों ओर से उसको सफलताएँ मिलती हुई चली जाती है। सारे के सारे महापुरुषों को आप देखिए, कोई भी आदमी दुनिया के पर्दे पर आज तक ऐसा नहीं हुआ है, जिसको दैवीय सहयोग न मिला हो, जिसको जनता का सहयोग न मिला हो, जिसको भगवान का सहयोग न मिला हो। ऐसे एक भी आदमी का नाम आप बताइए जिसके अंदर से वे विशेषताएँ पैदा न हुई हों, जिनसे आप दूर रहना चाहते हैं, जिनसे आप बचना चाहते हैं। जिनके प्रति आपका कोई लगाव नहीं है। वह चीजें जिनको हम आशीर्वाद कहते हैं, सिद्धांतवाद कहते हैं। दुनिया के हिस्से का हर आदमी जिसको श्रेय मिला हो, धन भी मिला है। जहाँ आदमी को श्रेय मिलेगा वहीँ उसे वैभव भी मिले बिना रहेगा नहीं। संत गरीब नहीं होते। वे उदार होते हैं और जो पाते हैं- खाते नहीं, दूसरों को खिला देते हैं। देवत्व इसी को कहते हैं।

आदमी के भीतर का माद्दा जब विकसित होता है तो बाहरी दौलत उसके नजदीक बढ़ती चली जाती है। उदाहरण क्या बताऊं- प्रत्येक सिद्धांतवादी का यही उदाहरण है। उन्हीं को मैं देव भक्त कहता हूँ। देव उपासक उन्हीं को मैं कहता हूँ। उन्हीं की देव भक्ति को मैं सार्थक मानता हूँ जो अपने गुणों के आकर्षण के आधार पर देवता को अपने आकर्षण में खींच सकने में समर्थ हुए। आपकी भाषा में कहूँ तो देवता जब प्रसन्न होते हैं तो आदमी को देव तत्व के गुण देते हैं, देवत्व के कर्म देते हैं, देवत्व का चिंतन देते हैं और देव तत्व का स्वभाव देते हैं। यह मैंने आपकी भाषा में कहा है। हमारी परिभाषा इससे अलग है। मैं यह कह सकता हूँ कि आदमी अपने देवत्व के गुणों के आधार पर देवता को मजबूर करता है, देवता पर दबाव डालता है उसे विवश करता है और यह कहता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए और सहायता करनी पड़ेगी। भक्त इतना मजबूत होता है जो भगवान के ऊपर दबाव डालता है और कहता है कि हमारा 'ड्यू' है। आप हमारी सहायता क्यों नहीं करते? वह भगवान से लड़ने को आमादा हो जाता है कि हमारी सहायता करनी चाहिए।

कामना करने वाले भक्त नहीं हो सकते। भक्त शब्द के साथ में भगवान की इच्छाएँ पूरी करने की बात जुड़ी रहती है। कामना पूर्ति आपकी नहीं भगवान की। भक्त की रक्षा करने का भगवान व्रत लिए हैं- 'योगक्षेमं वहाम्यहम्‌'। यह सही है कि भगवान ने योग क्षेम को पूरा करने का व्रत लिया है, पर हविश पूरी करने का जिम्मा नहीं लिया। आपका योग और क्षेम अर्थात आपकी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना उनकी जिम्मेदारी है। आपकी बौद्धिक, मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना भगवान की जिम्मेदारी है, पर आपकी हविश पूरी नहीं हो सकती। हविशोँ के लिए, तृष्णाओँ के लिए भागिए मत। यह भगवान की शान में, भक्त की शान में, भजन की शान में गुस्ताखी है, सबकी शान में गुस्ताखी है। भक्त और भगवान का सिलसिला इसी तरह से चलता रहा है और इसी तरीके से चलता रहेगा। भगवान माँगते नहीं दिया करते हैं। भगवान कोई इंसान नहीं हैं, उसे तो हमने बना लिया है। भगवान वास्तव में सिद्धांतों का समुच्चय हैं, आदर्शों का नाम है, श्रेष्ठता के समुच्चय का नाम है। सिद्धांतों के प्रति, आदर्शों के प्रति आदमी के जो त्याग और बलिदान हैं वस्तुतः यही भगवान की भक्ति है। देवत्व इसी का नाम है।

प्रामाणिकता आदमी की इतनी बड़ी दौलत है कि जनता का उस पर सहयोग बरसता है, स्नेह बरसता है, समर्थन बरसता है। जहाँ स्नेह, समर्थन और सहयोग बरसता है, वहाँ आदमी के पास किसी चीज की कमी नहीं रह सकती। बुद्ध की प्रमाणिकता के लिए, सद्भावना के लिए, उदारता के लिए लोगों ने उनके ऊपर पैसे बिखेर दिए। गाँधीजी की प्रामाणिकता और सद्भावना, श्रेष्ठ कामों के लिए; उनकी लगन, उदारता लोकहित के लिए थी। व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को लेकर चलने पर वे भक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होते चले गए। सारे समाज ने उनको सहयोग दिया, दान दिया और उनकी आज्ञा का पालन किया। लाखों लोग उनके कहने पर जेल चले गए और अपने सीने पर गोलियाँ खाईँ। क्या यह हो सकता है? हाँ! शर्त एक ही है कि आप प्रकाश की ओर चलें, छाया अपने आप आपके पीछे- पीछे चलेगी। आप तो छाया के पीछे भागते हैं, छाया ही आप पर हावी हो गई है। छाया का अर्थ है- माया। आप प्रकाश की ओर चलिए, भगवान की ओर चलिए, सिद्धांतों की ओर चलिए। आदर्श और सिद्धांत इन्हीं का नाम हनुमान है, इन्हीं का नाम भगवान है।

मित्रों! जो हविश आपके ऊपर हावी हो गई है उससे पीछे हटिए, तृष्णाओँ से पीछे हटिए और उपासना के उस स्तर पर पहुँचने की कोशिश कीजिए जहाँ कि आपके भीतर से, व्यक्तित्व में से श्रेष्ठता का विकास होता है। भक्ति यही है। अगर आपके भीतर श्रेष्ठता का विकास हुआ है, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको जनता का वरदान मिलेगा। चारों ओर से इतने वरदान मिलेंगे कि आप निहाल हो जाएँगे। भक्ति का यही इतिहास है, भक्त का यही इतिहास है। भक्त के अनुग्रह का यही इतिहास है। आप यह समझ लें कि आपको सद्गुणोँ का विकास करने की तपस्या करनी है और भगवान हमको गुण, कर्म और स्वभाव की विशेषता देंगे और हमें चरित्रवान व्यक्ति के रूप में विकसित करेंगे। चरित्रवान व्यक्ति जब विकसित होता है तो उदार हो जाता है, परमार्थ- परायण हो जाता है, लोकसेवी हो जाता है, जनहितकारी हो जाता है और अपने क्षुद्र स्वार्थ छोड़ देता है। यदि आपकी ऐसी मनःस्थिति हो जाए तो समझना चाहिए कि आपने सच्ची उपासना की और वरदान पाया।

मैं चाहता था कि आपलोग यह प्रेरणा लेकर जाएँ कि भगवान हम पर कृपा करें कि श्रेष्ठता के लिए, आदर्शों के लिए कुछ त्याग और बलिदान करने की, चरित्रवान बनने की शक्ति मिले। यदि ऐसा हुआ तो उसके फलस्वरूप आप जो कुछ भी प्राप्त करेंगे, वह इतना शानदार होगा कि आप निहाल हो जाएँ, आपका देश निहाल हो जाए और हम निहाल हो जाएँ।
आज की बात समाप्त॥ ॐ शांति॥
अगली कड़ी में पढ़ें-
'कायाकल्प का मर्म और दर्शन'
धन्यवाद।

Saturday, March 19, 2011

मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान -2

पिछली कड़ी से आगे..

सफलता साहसिकता के आधार पर मिलती है। यह एक आध्यात्मिक गुण है। इसी आधार पर योगी को भी सफलता मिलती है, तांत्रिक को भी और महापुरुष को भी। हर एक को इसी साहसिकता के आधार पर सफलता मिलती है। चाहे वह डाकू क्यों न हो। आप योगी हैं तो अपनी हिम्मत के सहारे फायदा उठाएँगे। नेता हैं, महापुरुष हैं तो भी इसी आधार पर सफलता पाएँगे। यह एक दैवीय गुण है। इसे आप अपनी इच्छा के आधार पर इस्तेमाल कर सकते हैं, यह आप पर निर्भर है। इंसान के भीतर जो विशेषता है, वह गुणों की विशेषता है। देवता अगर किसी आदमी को देंगे तो गुणों की संपदा देंगे। गुणों से क्या हो जाएगा? गुणों से ही होता है सब कुछ। भौतिक अथवा आध्यात्मिक जहाँ कहीं भी आदमी को सफलता मिली है, केवल गुणों के आधार पर मिली है। श्रेष्ठ गुण न हों तो न भौतिक उन्नति मिलने वाली है, न आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है।
आदमी जितना समझदार है, नासमझ उससे भी ज्यादा है। यह भ्रांति न जाने क्यों आध्यात्मिक क्षेत्र में घुस बैठी है कि देवता मनोकामना पूरी करते हैं, पैसा देते हैं, दौलत देते हैं, बेटा- बेटी देते हैं, नौकरी देते हैं। इस एक भ्रांति ने इतना ज्यादा व्यापक नुकसान पहुँचाया है कि आध्यात्मिका का जितना बड़ा लाभ, जितना बड़ा उपयोग था, संभावनाएँ थीं, उससे जो सुख होना संभव था, उस सारी की सारी संभावना को इसने तबाह कर दिया। देवता आदमी को एक ही चीज देंगे और उन्होंने एक ही चीज दी है; प्राचीन काल में भी और भविष्य में भी। देवता यदि जिंदा रहेंगे, भक्ति यदि जिंदा रहेगी, उपासना क्रम यदि जिंदा रहेगा, तो एक ही चीज मिलती रहेगी और वह है- देवत्व का गुण। देवत्व के गुण अगर आएँ तब आप जितनी सफलताएँ चाहते हैं, उससे हजारों- लाखों गुनी सफलताएँ आपके पास आएँगी।
क्या आप चाहते हैं कि आपको देवत्व के स्थान पर कुछ रुपयों की नौकरी दिलवा दें। किसी देवता, संत के लिए वह नाचीज हो सकती है। लेकिन यदि देवता देवत्व प्रदान करते हैं, तो वह नौकरी आपको लिए इतनी कीमत की करवा सकते हैं कि आप निहाल हो जाएँगे। विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के पास नौकरी माँगने गए थे, पर मिला क्या- देवत्व, भक्ति, शक्ति और शांति। यह क्या चीज थे- गुण। मनुष्य के ऊपर कभी संत कृपा करते हैं, संतों ने कभी किसी को कुछ दिया है तो उन्होंने एक ही चीज दी है- अंतरंग में उमंग। एक ऐसी उमंग, जो आदमी को घसीट कर सिद्धांतों की ओर ले जाती है। जब आदमी के ऊपर सिद्धांतों का नशा चढ़ता है, तब उसका चुम्बकत्व, उसका आकर्षण, उसकी प्रामाणिकता इस कदर सही हो जाती है कि हर आदमी खींचा हुआ चला आता है और हर कोई सहयोग करता है। विवेकानंद को सम्मान और सहयोग दोनों मिला। यह किसने दी थीं- काली ने। काली अगर किसी को कुछ देंगी तो यही चीज देंगी। यदि दुनिया में दुबारा कोई रामकृष्ण जिंदा होंगे या पैदा होंगे, तो इसी प्रकार का आशीर्वाद देंगे, जिससे आदमी का व्यक्तित्व विकसित होता चला जाए। व्यक्तित्व विकसित होगा तो जिसे आप चाहेंगे वह सहयोग करेगा। तब सहयोग माँगा नहीं जाता, बरसता है। आदमी फेंकता जाता है और सहयोग बरसता जाता है। देवत्व जब आता है तो सहयोग बरसता है। बाबा साहब आम्टे का उदाहरण आपके सामने है; जिन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए, अपंगोँ के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया। यह क्या है? सिध्दांत है, आदर्श है और वरदान है। इससे कम में न किसी को वरदान मिला है और न किसी को मिलेगा। भीख माँगने पर देवताओं से न किसी को मिला है और न किसी को मिलेगा।
देवता एक काम करते रहते हैं। क्या करते हैं? फूल बरसाते हैं। रामायण में कोई पचास उल्लेख हैं देवताओं के फूल फहराने के। फूल क्या बरसाते हैं सहयोग बरसाते हैं। फूल किसे कहते हैं? सहयोग को कहते हैं। कौन बरसता है? देवत्व बरसता है जो अभी इस दुनिया में अभी जिंदा है। देवत्व ही दुनिया में जिंदा था और जिंदा ही रहने वाला है। देवत्व मरेगा नहीं। यदि हैवान या शैतान नहीं मर सका तो भगवान क्यों मरने लगा। इंसान, इंसान को देख कर आकर्षित होता है। देवता, देवता को देख कर आकर्षित होते हैं। और श्रेष्ठता को देख कर सहयोग आकर्षित होता है। पहले भी यही होता रहा था, अभी भी होता है और आगे भी होता रहेगा।
देवता कैसे होते हैं? देवता ऐसे होते हैं जो आदमी के ईमान में घुसे रहते हैं और उसके भीतर एक ऐसी हूक, एक ऐसी उमंग और एक ऐसी तड़पन पैदा करते हैं जो सारे के सारे जाल- जंजालोँ को तोड़ती हुई सिध्दांतोँ की ओर, आदर्शों की ओर बढ़ने के लिए आदमी को मजबूर कर देती है। इसे कहते हैं देवता का वरदान। इससे कम में देवता का वरदान नहीं हो सकता। आदमी के भीतर जब गुणों की, कर्मों की, स्वभाव की विशेषता पैदा हो जाती हैं तो विश्वास रखिए तब उसकी उन्नति के दरवाजे खुल जाते हैं। इतिहास में जितने भी आदमी सफल हुए हैं और जिनके सम्मान हुए हैं, उनमें से प्रत्येक, गुणों के आधार पर बढ़े हैं। देवता का वरदान गुण और चिंतन की उत्कृष्टता है। संसार के महापुरुषों में से हर एक सफल व्यक्ति का इतिहास यही रहा है। अनुग्रह की एक ही पहचान है- जिम्मेदारी का होना, समझदारी का होना।
पूजा क्यों करते हैं? पूजा का मतलब एक ही है- इंसानियत का विकास, कर्मों का विकास, स्वभाव का विकास। पूजा के द्वारा वस्तुतः दया मिलती है, शराफत मिलती है, ईमानदारी मिलती है। आदमी को ऊँचा दृष्टिकोण मिलता है। अगर आपने दूसरी पूजा की होगी तो आप भटक रहे होंगे। पूजा आपको इसी तरीके से करनी चाहिए की जो पूजा के लाभ आज तक इतिहास में मनुष्यों को मिले हैं, वह हमको भी मिलने चाहिए। हमारे गुणों का विकास, कर्म का विकास, चरित्र का विकास और भावनाओं का विकास होना चाहिए। देवत्व इसी का नाम है। देवत्व यदि आपके पास आएगा तो आपके पास सफलता आएँगी। हिंदुस्तान के इतिहास पर नजर डालिए, उसके पन्नों पर जो बेहतरीन आदमी दिखाई देते हैं, वे अपनी योग्यता और अपनी विशेषता के आधार पर महान बने हैं। महामना मालवीय जी का नाम सुना है आपने, कितने शानदार व्यक्ति थे वे। उन पर देवताओं का वरदान बरसा था और छोटे आदमी से वे महान हो गए।
क्रमशः.

Saturday, March 12, 2011

स्वतंत्रता दिवस की बधाई!

दोस्तों यह ब्लॉग मैंने स्वतंत्रता दिवस पर लिखा था लेकिन तब मैं इसे प्रकाशित नहीं कर पाया था लेकिन आज जब मैं इसे पढ़ रहा था तो मुझे यह आज भी उतना ही प्रासंगिक लगा और मैं इसे अपने तक सीमित रख पाने का धैर्य नहीं रख पाया। इसी कारण से मैं इसे आज प्रकाशित कर रहा हूँ । 

आपको स्वतंत्रता दिवस की बधाई!
लेकिन क्या हम आज के दिन बधाई देने या लेने के योग्य रह पाए या कहिए बन पाए हैं? लेकिन यह भी एक सत्य, कटु सत्य है कि हम इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते। हमारे देश में अंग्रेजोँ से आजादी के बाद से अभी तक कभी भी नागरिकों की कद्र नहीं रही। हमारे नीति निर्माताओं ने जाने अनजाने गैर नागरिक तत्वों को बल एवं सुरक्षा प्रदान किया है। आम नागरिक के लिए अपना उचित अधिकार पाना भी दिन पर दिन दुभर होता जा रहा है जबकि तथाकथित संविधान के विरुद्ध जाकर आचरण करने वालों के लिए अपनी अनुचित माँगें भी पूरी करा लेने के उदाहरण बढ़ते जा रहे हैं। सड़क जाम, रेल रोकने, सार्वजनिक संपत्तियोँ को नुकसान पहुँचाने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
आरक्षण का ऐसा जहर हमारे बीच बो दिया गया है जो हर एक बीते दिन के साथ गृह युद्ध की बुनियाद रख रहा है। आए दिन एक नया समुदाय अपने लिए आरक्षण की माँग कर रहा है। दरअसल कुल आरक्षण के बाद बची जगहों पर चयन के लिए लोग अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं कायम रख पा रहे हैं।
भाषाई आधार पर बनी दूरियोँ को कम करने के स्थान पर इतना गहरा कर दिया गया है जो हर आने वाले वर्ष में एक नए राज्य की सीमा तैयार कर रहा है। एक राज्य दूसरे राज्य के साथ सहयोग एवं सामंजस्य के द्वारा उन्नति करने के बजाय एक दूसरे को अपना शत्रु समझ रहे हैं। कोई भी ऐसे पड़ोसी राज्य नहीं हैं जिनमें किसी मुद्दे को लेकर विवाद न हो। जब कई देश आपस में संबंध सुधारने के प्रयास कर रहे हैं, ऐसा लगता है हमारी सीमाओं के भीतर ही कई देश बन गए हैं। हम अनेक छोटे देशों जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तिब्बत, इराक, ईरान आदि की हालत से सबक लेने को तैयार नहीं हैं।
परिवार की सीमाएँ छोटी होती जा रही हैं। एक ओर कार्य की विवशता से परिवार बिखर रहे हैं लेकिन इससे ज्यादा नुकसान भावनात्मक लगाव टूटने से हो रहा है। लोग रिश्तोँ को संभालने के बजाय उन पर से गुजरते हुए अपने लिए रास्ते तलाश रहे हैं। परिणाम स्वरूप बच्चों पर से उन अनुभवी हाथों का सहारा हटता जा रहा है जो उन्हें गलत सुरों को छेड़ने से पहले ही सँवार लेते थे। आज, अश्लीलता, नशे में जकड़े अनजान राहोँ पर चलते बच्चे एक चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
अशिक्षा, लगातार बढ़ती जनसंख्या, भ्रष्टाचार के नित नए आयाम, प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन, अमीरोँ एवं गरीबों में बढ़ता अंतर आदि कई अन्य बिंदु हैं जहाँ निराशा मिली है।
वस्तुतः अंग्रेजोँ ने जो शासन व्यवस्था बनाई हम कमोबेश उसी पर चलते रहे हैं। एक तो अंग्रेजोँ ने वह व्यवस्था अपने राज्य को सुदृढ़ एवं संपन्न बनाने के लिए की थी भले इसका कुछ भी प्रभाव स्थानीय लोगों पर पड़ता हो। दूसरे, ब्रिटेन या अमेरिका जैसे देशों से हमारी आवश्यकताएँ सर्वथा भिन्न हैं। यह सच है कि, आज हम उन्हीं अंग्रेजोँ द्वारा रखी बुनियाद पर चलते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं जिसमें आज की बहुमँजिला इमारतें, रेल गाड़ियाँ, डाक व्यवस्था, बैंकिंग क्षेत्र, आधुनिक सैन्य व्यवस्था आदि बहुत से अन्य आयाम शामिल हैं।
लेकिन यह भी सच है कि इनमे से अधिकतर सुविधाएँ हमारी मज़बूरी हैं न कि हमारा चुनाव। व्यक्ति इन्हीं सुविधाओं में अपने जीवन के वास्तविक मूल्य खोज रहा है और इन्हीं मशीनों के जैसे व्यवहार कर रहा है। आज व्यक्ति इन सुविधाओं पर नियत्रण रखने और नियंत्रण करने कि बजाए खुद उनके नियंत्रण में होता जा रहा है।  हम एक जबरदस्त भंवर में फंसते जा रहे हैं जिसमें हम नौकरी की (जी हाँ नौकरी की!) शिक्षा पाते हैं फिर अपने बच्चों को वही शिक्षा दिलाते हैं और ये क्रम कई पीढ़ियों से हमारे समाज में चल रहा है। हममें से बहुत कम लोग मौलिक स्तर पर कुछ सोच पाते हैं या कर पाते हैं। हमें इन समस्याओं के समाधान शीघ्र खोजने होंगे।

मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान

देवियोँ! भाइयों!!
देवताओं के अनुग्रह की बात आपने सुनी होगी। देवता नाम ही इसलिए रखा गया
है क्योंकि वे दिया करते हैं। प्राप्त करने की इच्छा से कितने ही लोग
उनकी पूजा करते हैं, उपासना करते हैं भजन करते हैं, आइए- इस पर विचार
करते हैं।
देवता देते तो हैं, इसमें कोई शक नहीं है। अगर वे देते न होते तो उनका
नाम देवता न रखा गया होता। देवता का अर्थ ही होता है- देने वाला। देने
वाले से माँगने वाला कुछ माँगता है तो कुछ गलत बात नहीं है। पर विचार
करना पड़ेगा कि, आखिर देवता देते क्या हैं? देवता वही चीज देते हैं जो
उनके पास है। जो जिसके पास जो चीज होगी, वही तो दे पाएगा! देवताओं के पास
और चाहे जो हो पर एक चीज अवश्य है- देवत्व। देवत्व कहते हैं- गुण, कर्म
और स्वभाव तीनों की श्रेष्ठता को। इतना देने के बाद देवता निश्चिँत हो
जाते हैं, निवृत्त हो जाते हैं और कहते हैं कि हम जो दे सकते थे वह दिया।
अब आपका काम है कि, जो चीज हमने आपको दी है, उसको आप जहाँ भी मुनासिब
समझें, इस्तेमाल करें और उसी किस्म की सफलता पाएँ।

दुनिया में सफलता एक चीज के बदले में मिलती है- उत्कृष्ट व्यक्तित्व के
बदले। इससे कम में कोई चीज नहीं मिल सकती। अगर कहीं से किसी ने घटिया
व्यक्तित्व की कीमत पर किसी तरीके से अपने सिक्के को भुनाए बिना, अपनी
योग्यता का सबूत दिए बिना, परिश्रम के बिना, गुणों के बिना, कोई चीज
प्राप्त कर ली है तो वह उसके पास ठहरेगी नहीं। शरीर में हज़म करने की ताकत
न हो तो जो खुराक आपने ली है, वह आपको हैरान करेगी, परेशान करेगी। इसी
तरह संपत्तियोँ को, सुविधाओं को हज़म करने के लिए गुणों का माद्दा नहीं
होगा तो वे आपको तंग करेंगी, परेशान करेंगी। अगर गुण नहीं हैं तो जैसे
जैसे दौलत बढ़ती जाएगी वैसे वैसे आपके अंदर दोष- दुर्गुण बढ़ते जाएँगे,
अहंकार बढ़ता जाएगा और आपकी जिंदगी को तबाह कर देगा।

देवता क्या देते हैं? देवता हज़म करने की ताकत देते हैं। जो दुनियाबी दौलत
या जिन चीजों को आप माँगते हैं, जो आपको खुशी का बायस मालूम पड़ती हैं, उन
सारी चीजों का लाभ लेने के लिए विशेषता होनी चाहिए। इसी का नाम है-
देवत्व। देवत्व यदि प्राप्त हो जाता है तो आप दुनिया की हर चीज से, छोटी
से छोटी चीज से फायदा उठा सकते हैं। ज्यादा चीजें हो जाएँ तो भी अच्छा
है, यदि न हो पाएँ तो भी कोई हर्ज नहीं। मनुष्य के शरीर में ताकत होनी
चाहिए लेकिन समझदारी का नियंत्रण न होने से आग में घी डालने के तरीके से
वह सिर्फ दुनिया में मुसीबतेँ पैदा करेगी। इंसानियत उस चीज का नाम है;
जिसमें आदमी का चिंतन, दृष्टिकोण, महत्वाकांक्षाएँ और गतिविधियाँ ऊँचे
स्तर की हो जाती हैं। इंसानियत एक बड़ी चीज है।

मनोकामनाएँ पूरी करना बुरी बात नहीं है, पर शर्त एक ही है कि किस काम के
लिए, किस उद्देश्य के लिए माँगी गई हैं? यदि सांसारिकता के लिए माँगी गई
हैं तो उससे पहले यह जानना जरूरी है कि उस दौलत को हज़म कैसे करेंगे? उसे
खर्च कैसे करेंगे? देवताओं के संपर्क में आने पर हमें सद्गुण मिलते हैं,
देवत्व मिलता है। सद्गुणोँ से व्यक्ति को विकास करने का अवसर मिलता है।
गुणों के विकसित होने के बाद मनुष्यों ने वह काम किए हैं जिन्हें सामान्य
बुद्धि से वह नहीं कर सकते थे। देवत्व के विकसित होने पर कोई भी उन्नति
के शिखर पर जा पहुँच सकता है, चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक। संसार
और अध्यात्म में कोई फर्क नहीं पड़ता। गुणों के इस्तेमाल करने का तरीका भर
है। गुण अपने आप में शक्ति पुंज हैं, कर्म अपने आप में शक्ति पुंज हैं,
स्वभाव अपने आप में शक्ति पुंज हैं। इन्हें कहाँ इस्तेमाल करना है, यह आप
पर निर्भर है।
क्रमशः ...

आइए चर्चा करें

नमस्कार।
मित्रों मेरे पास कुछ पुस्तकें हैं जिनका अध्ययन मेरे मत से हमारे
व्यावहारिक जीवन के लिए काफी उपयोगी हो सकता है। मैं उनमें से कुछ लेख
यहाँ प्रकाशित करने का प्रयास करूँगा। यदि आपको उपयोगी लगें तो इसे लिँक
करके औरों तक भी पहुँचाएँ। यदि कुछ न जँचे तो टिप्पणी से मुझे सूचित भी
करें।
हो सकता है मेरा प्रयास पूरा न पड़े और बीच में व्यतिक्रम हो तो उसके लिए
मैं पूर्व में ही क्षमा चाहूँगा।

--
durgadatt c.

Tuesday, March 8, 2011

वो पल नहीं भूला हूँ

वो 2001 के जून का महीना था। उस समय मैं अपनी संक्षिप्त तकनीकी शिक्षा
पूरी करके गुडगाँव की एक कंपनी में अस्थाई तौर पर कार्य करता था। कार्य
करते लगभग तीन महीने ही हुए थे। गुडगाँव शहर से करीब आठ किलोमीटर दूर एक
छोटा बाजार है मानेसर, उसके थोड़ा पहले एक गाँव में रहता था। अपनी छोटी
जरूरतों को छोड़कर बाकी के लिए गुडगाँव जाना पड़ता था। वेतन मिला था और मैं
कुछ सामान जिसमें; 'रोजगार समाचार' लेना प्रमुख था, के लिए गुडगाँव गया
था।
गुडगाँव जाने के लिए टेँपो मिलता था लेकिन वापसी के लिए टेँपो के बजाय हम
जीप पकड़ना पसंद करते थे। सो मैं एक जीप में गया। जीप लम्बी दूरी के लिए
चलती थी इसलिए हमें लेने में थोड़ी आनाकानी करते थे। खैर जीप खाली थी
इसलिए मुझे जगह मिल गई। मैं अपनी पसंद से आगे की सीट पर बैठ गया। कुछ देर
बाद एक यात्री आया जो आगे की सीट पर ही बैठना चाहता था सो जीप वाले ने
मुझे बीच की सीट पर बैठने को कहा। मैं भी चुपचाप बीच में बैठ गया। कुछ
देर बाद एक और यात्री आया और पीछे की सीट पर बैठने से मना कर दिया सो जीप
वाले ने फिर मुझे पीछे की सीट पर बैठ जाने को कहा। मुझे थोड़ा गुस्सा तो
आया लेकिन मैंने कुछ बोले बगैर पीछे जाकर बैठ गया- मजबूरी थी।
जब जीप चली तो उसमें लगभग नौ या दस लोग थे, पीछे की तरफ मेरे अलावा एक और
यात्री था- मैं बाएँ तरफ वो दाईँ तरफ। मेरी एक आदत थी या अब भी है, कि
गाड़ी चलते समय यदि संभव हुआ तो मैं सामने सड़क पर एवं स्पीडोमीटर पर नजर रखता हूँ;
उस दिन भी मैं यही कर रहा था। सो मैं देख रहा था कि गाड़ी लगभग अस्सी
किलोमीटर प्रति घंटे की चाल से चल रही थी। शहर अभी खतम भी नहीं हुआ था
लेकिन कुछ दूर का रोड डिवाइडर खतम हो गया था। चालक गाड़ी चलाने के साथ ही
अपने बगल के यात्री से बात भी कर रहा था। तभी सामने से आता एक ट्रक जो
आगे की गाड़ी से ओवरटेक कर रहा था दिखाई दिया। जब तक जीप का चालक कुछ समझ
कर जगह दे पाता ट्रक ने पूरी गति से जीप के दाहिने तरफ बीच में टक्कर मार
दी। यह पूरी घटना एक सेकंड के चौथाई भाग में घटी लेकिन मैंने उसे घटित
होते देखा। इसके बाद का शायद आप कुछ अंदाज लगा सकते हैं। जीप दो पूरी तरह
चित्त! मुझे चोट आयी थी लेकिन मुझे उसका अंदाजा नहीं था, मैं खुद को
संभालते हुए जीप के बाहर आया। इसके बाद मैंने जो देखा उस पर मेरी आँखो को
विश्वास नहीं हुआ। अब तक मैंने किसी को मरते नहीं देखा था- किसी जानवर को
भी नहीं, लेकिन वहाँ मैंने न सिर्फ देखा बल्कि उन्हें महसूस भी किया। दो
यात्री मेरे सामने मर गए और वो और कोई नहीं, वही दो थे जो मेरी जगह पर
बैठ गए थे। शेष जो थे उनमें एक भी खुद से उठने में सक्षम नहीं था। मैं
हतबुद्धि खड़ा था। काफी भीड़ जमा हो गई थी। लेकिन वे सब केवल दर्शक मात्र
थे। उनमें से ही एक ने मुझे मेरे घाव की तरफ इशारे से बताया। मैंने सिर
के पीछे हाथ लगाया तो मेरा हाथ खून से रंग गया। एक स्कूटर वाले से
अस्पताल तक लिफ्ट देने को कहा तो वह अपनी गाड़ी ले कर भाग गया। दूसरा आगे
आया लेकिन बोला मैं- अस्पताल के दरवाजे तक ही छोड़ूँगा। मुझे और क्या
चाहिए था। फिर मैं अस्पताल पहुँचा। वहाँ थोड़ी औपचारिकता के बाद मेरा इलाज
शुरू हुआ। तब तक पुलिस की सहायता से और भी घायल आने लगे।
अस्पताल से प्राथमिक चिकित्सा के बाद छुट्टी मिल गई- सिर के पिछले हिस्से
में आठ टाँके आए थे। अस्पताल से मैं पैदल ही निकल लिया और घटना स्थल तक
पहुँच गया। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि मौत दो बार मुझ तक आते आते रह
कैसे गई? आज भी मैं यह नहीं समझ पाया हूँ कि यहाँ 'जाको राखे साईयाँ';
वाली बात सही हुई या 'जितनी चाबी भरी राम ने'; वाली।
एक और विकल्प है लेकिन वह कमजोर है। मैं एक संस्था से जुड़ा हूँ और नियमित
अपनी सहयोग राशि वेतन मिलने पर भेज दिया करता था। दुर्घटना वाले दिन ही
उसकी एक रसीद मुझे मिली थी और मेरे जेब में थी। क्या मैं उस कारण बच गया?
यह पक्ष कमजोर इसलिए है कि इसमें मुझे बचा लेना हो सकता है लेकिन मेरी
जगह किसी और को मार देना तो नहीं ही हो सकता।
कुछ भी हो लेकिन अगर मैं मर जाता तो पुलिस के पास मुझे एक अनजान व्यक्ति
की तरह निपटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता क्योंकि मेरे पास पहचान का
कोई साधन ही नहीं था।
एक अफसोस भी रहता है कि मैं अपनी चोट में घबरा कर दूसरों की कोई सहायता
नहीं कर पाया हालाँकि मैं हिम्मत से काम ले के ये कर सकता था।
आज उस घटना को लगभग दस साल बीत चुके हैं लेकिन अब भी मेरे जेहन में वो
घटना जस की तस है, चोट का एक टाँका भी क्योंकि जिस डॉक्टर ने वे काटे
उसने गलती से एक टाँका सिर में ही छोड़ दिया। अब तो उस पर चमड़ी आ चुकी है।
इस घटना से एक बात सीखी- कहीं भी चलो तो कम से कम अपने पहचान का कोई साधन
ले के अवश्य चले।

Tuesday, March 1, 2011

महा शिवरात्री

आप सभी को महा शिवरात्री की शुभकामनाएँ।

----------
मेरें Nokia फ़ोन से भेजा गया

Friday, February 25, 2011

चोरी या सीनाजोरी

जी हाँ बिल्कुल ठीक पढ़ रहे हैं आप। मुझे नहीं मालूम यह पूरे देश में हो रहा है या नहीं पर उत्तर प्रदेश एवं बिहार में यही स्थिति है।
यहाँ सरकारी वाहनों एवं सरकारी काम पर लगे निजी वाहनों से ईंधन (डीजल या पेट्रोल) की चोरी सरेआम हो रही है। यह चोरी मुख्य रूप से ऑटो चालकों को या निजी वाहनों में प्रयोग के लिए बेचने के लिए की जा रही है। चोरी करने के लिए ग्राहक डब्बा ले कर पहले से नियत स्थान पर मौजूद रहता है जिसे फ्यूल पंप से कम कीमत पर तेल बेचा जाता है।
तेल बेचने का काम सुबह कार्यालय खुलने से पहले या शाम को कार्यालय बंद होने के बाद या कभी कभी मौका मिलने पर बीच में भी होता है।
वाहन चालक तेल बेचने के बाद ट्रिपमीटर/ मीटर रीडर को आवश्यकतानुसार सेट करता है।
इन चोरोँ का आत्मविश्वास इतना अधिक होता है कि ये लोगों के सामने ही तेल निकालते और बेचते हैं।
अजी और भी नमूने हैं-
यहाँ पर लोगों को अपने दोपहिया वाहनों पर नियमानुसार रजिस्ट्रेशन क्रमांक लिखने में अपनी मानहानि महसूस होती है तभी तो लगभग नब्बे प्रतिशत दोपहिया वाहनों के सिर्फ पिछले नंबर प्लेट पर ही नंबर लिखे दिखाई देते हैं जबकि नियमानुसार गाड़ी के दोनों तरफ नंबर लिखा होना चाहिए। हद तो यह है कि पुलिस वालों की गाड़ियों पर भी नंबर नहीं लिखे होते। वे दूसरों को क्या नियम बताएँगे?
और देखिए..
आप देश के किसी भी भाग से रेलगाड़ी से यात्रा करते हुए उत्तर प्रदेश या बिहार आइए। यदि आप राजधानी एक्सप्रेस या ऐसी दूसरी गाड़ी में सफर नहीं कर रहे हैं तो आपकी गाड़ी पूरी यात्रा के दौरान जितने पड़ाव लेगी उसके आधे से ज्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार में चलने के दौरान लेगी। आप सोच रहे होंगे कि इन दो राज्यों में चलने के दौरान दूरी ज्यादा होती होगी। जी नहीं, ऐसा नहीं है। यहाँ एक ओर तो रेलवे की ढीली व्यवस्था के कारण कोई नहीं जानता कि गाड़ी कब कहाँ कितने समय के लिए खड़ी हो जाएगी, दूसरी ओर कुछ लोगों को गाड़ी से ठीक अपने घर के सामने उतरने की आदत है। इसलिए वे अपने घरों के सामने गाड़ी खड़ी करते हैं और ऐसा अनेकोँ बार नहीं अनगिनत बार भी हो सकता है। रेलगाड़ी खड़ी करने के लिए वे क्या करते हैं यह तो वे लोग जानें या रेलवे के लोग पर आम लोग इसे चेन खींचना कहते हैं। जहाँ तक सुरक्षा कर्मियों की बात है वे या तो सोते रहते हैं या ताश खेलते हैं या अपनी वसूली (जी हाँ) करते रहते हैं।
और? अरे बस भी! फिर अगली बार।

Tuesday, January 25, 2011

पटना का गाँधी मैदान

गाँधी मैदान जिसका नाम पहले पटना लौँस था पटना में गंगा नदी से कुछ दूरी पर स्थित है। शहर की कई महत्वपूर्ण सरकारी एवं गैर सरकारी इमारतें गाँधी मैदान के आसपास हैं। इनमें होटल मौर्य, श्री कृष्ण विज्ञान केंद्र, सेंट झेवियर हाई स्कूल, ए॰एन॰ सिंहा समाज अध्ययन केंद्र, हथवा मार्केट एवं बिस्कोमान भवन(शहर की सबसे ऊँची इमारत) शामिल हैं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई महत्वपूर्ण आंदोलन इस मैदान से शुरू हुए। चम्पारण का सत्याग्रह एवं 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन इनमें प्रमुख हैं। महात्मा गाँधी, अनुग्रह नारायण सिंहा, सरदार पटेल,मौलाना आजाद, जवाहर लाल नेहरू, जय प्रकाश नारायण जैसे दिग्गज नेताओं ने अपनी रैलियाँ कीं। वर्तमान में भारतीय स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस पर क्रमशः बिहार के मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल यहाँ तिरंगा फहराते हैं। इसके अलावा जिला प्रशासन व्यापार मेला आदि के लिए भी इसका उपयोग करता है।
गाँधी मैदान का दुःखद पहलू यह है कि एक ऐतिहासिक स्थल एवं पटना का पहचान चिन्ह होने के बावजूद इसकी देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं है। यह मैदान दिन भर लोगों के लिए खुला रहता है। लोग बिना रोक टोक मैदान के लगभग हर भाग में पेशाब करते हैं, मूँग फलियाँ खाकर कचरा फेँकते हैं। काफी संख्या में तमाशेबाज धूर्त लोग सीधे सादे लोगों को फाँस कर दवाइयों, तंत्र- मंत्र- टोटकोँ के नाम पर प्रतिदिन हजारों रुपए का काला धन्धा करते हैं।यह सब पुलिस के सामने एवं उनकी जानकारी में चलता है।गाँधी मैदान के चारों तरफ पगडंडी पर ठेले रिक्शे वालों का कब्जा रहता है।
बिहार सरकार एवं स्थानीय प्रशासन देश के अन्य महानगरों से सबक ले कर इसे एक आकर्षण का केंद्र बना सकते हैं वहीँ बाहर से आने वाले गाँधी मैदान को देख कर जाएँगे।

Tuesday, January 18, 2011

मेरे भाई की सगाई हुई

पिछले माह मेरे छोटे भाई की सगाई हुई। विवाह 8 फरवरी 2011 को होना तय हुआ है।
व्यस्तता भरे इस जीवन शैली में विवाह जैसे अवसर एक सुखद संयोग हैं जब पूरे परिवार के सदस्योँ के साथ- साथ अधिकतर रिश्तेदार भी आपस में मिल लेते हैं।
ऐसा ही यह संयोग मेरे परिवार में आया है जिसमें कुछ सदस्य आपस में लगभग दस वर्ष बाद मिल सकेंगे।
There was an error in this gadget