Saturday, April 16, 2011

कायाकल्प का मर्म और दर्शन- 2

पिछली कड़ी से आगे..

जिस दिन आपको यह बोध हो जाएगा कि हम जीवात्मा हैं, शरीर नहीं, उसी दिन आपका मौत का भय निकल जाएगा और योजनाएँ ऐसी बनेंगी जो आपके जन्म- जन्मांतर की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ होंगी। आज तो आप छोटे आदमी हैं, और छोटी समस्याओं में उलझे रहते हैं। पेट कैसे भरेगा? कपड़ा कहाँ से मिलेगा? मकान का किराया कैसे चुकाएँगे? लड़कियों की शादी कैसे होगी? नौकरी में तरक्की कैसे होगी? आदि, आदि। लेकिन कभी आप अमर हो गए तब? तब आप अमर लोगों की तरह विचार करेंगे और यह सोचेंगे कि अपने उत्थान के साथ- साथ सारे विश्व का उत्थान करने के लिए क्या करना चाहिए और कैसा बनना चाहिए।

कायाकल्प शरीर का नहीं हो सकता, प्रकृति का हो सकता है। प्रकृति ही बदल सकती है आदमी की। आकृति? आकृति नहीं बदल सकती। आकृतियाँ नहीं बदल सकतीं आदमी की, प्रकृति बदल सकती है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी के बारे में रामायण में कहा है। तीर्थराज त्रिवेणी का महात्म्य बताते हुए उन्होंनें कहा है कि कौआ कोयल हो जाता है, बगुला हँस हो जाता है। कौआ और कोयल एक जैसे दिखाई देते हैं लेकिन उनकी प्रकृति में अंतर है। हँस और बगुला दोनों एक जैसे दिखाई देते हैं लेकिन उनकी प्रकृति में अंतर है। फिर कौआ कोयल और बगुला हँस कैसे हो जाते हैं। यहाँ प्रकृति बदलने की बात है, शरीर बदलने की नहीं।

यह कायाकल्प है। आपको यहाँ अपना कायाकल्प करने की तैयारी करनी चाहिए। शरीर कल्प नहीं, मनः कल्प। मनः कल्प कैसे करें? इस तरह करें कि आपका क्षुद्रता का दायरा महानता के दायरे में बदल जाए। आपका दायरा बहुत छोटा है। एक छोटे से दायरे में आपने अपने आप को सीमित किया हुआ है। अब आप असीम बन जाइए। आप सीमित रहने से इंकार कर दीजिए। आप पिंजड़े के पंछी की तरह जिंदगी मत बिताइए। आप उड़ने की तैयारी कीजिए। कितना बड़ा आकाश है, इसमें स्वच्छन्द विचरण करने के लिए उमंगें जगाइए और पिंजड़े की कारा में रहने से इंकार कर दीजिए। आपको लगता है कि आप पिंजड़े की दीवारों में सुरक्षित हैं, यहाँ हमको चारा, दाना मिल जाता है; लेकिन कभी आपने खुली हवा में साँस ली है और आपने अपने पंखों के सहारे आसमान में उड़ने का आनंद लिया है? अब आप ऐसा करने की कोशिश कीजिए। अपने आप को बंधन मुक्त करने की कोशिश कीजिए। आप भव- बंधनों में जकड़े हुए आदमी मत रहिए। आप मुक्त इंसान की तरह विचार कीजिए। आप नर से नारायण बनने की महत्वाकांक्षा तैयार कीजिए। आप उसी क्षुद्र महत्वाकांक्षा में उलझे रहेंगे क्या? कौन सी? लोकेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेषणा। नहीं, आप कुछ और बड़ी महत्वाकांक्षा को लाइए। आप पुरुष से पुरुषोत्तम बनिए, आप नर से नारायण बनने पर विचार कीजिए। आप कामनाओँ की आग में जलने की अपेक्षा भावनाओं के स्वर्ग और शांति में प्रवेश कीजिए। कामनाओँ में ही लगे रहेंगे क्या? आप माँगते ही रहेंगे क्या? भिखारी ही बने रहेंगे क्या? नहीं, आप भिखारी बने रहने से इंकार कर दीजिए। अब आप दानी बनिए। जिंदगी भर आपने अपेक्षाएँ की हैं, एक के बाद दूसरी अपेक्षा। गणेशजी हमको यह दे देंगे, साईँ बाबा हमको यह दे देंगे, पत्नी यह देगी, बच्चा यह देगा। आपका सारा जीवन भिखमंगोँ की तरह व्यतीत हो गया। अब आप कृपा कीजिए और अपना रवैया बदल दीजिए। आप यह मान कर चलिए कि आप दान देने में समर्थ हैं और आप देंगे। अपनी धर्मपत्नी को कुछ न कुछ जरूर देंगे आप। उसकी योग्यता कम है, तो योग्यता बढ़ाइए, उसका स्वास्थ्य कमजोर है तो स्वास्थ्य बढ़ाइए। आप उसकी उन्नति का रास्ता नहीं खोलेंगे? उसके सम्मान को नहीं बढ़ाएँगे आप? उसके भविष्य को नहीं बनाएँगे? आप ऐसा कीजिए और फिर देखिए, आप दानी हो जाते हैं कि नहीं। आप भिखारी रहेंगे तो उससे कामवासना की बात करेंगे, उससे मीठी बातों की माँग करेंगे, सहयोग की माँग करेंगे, माँगते ही रहेंगे। फिर आप हैरान होंगे और दूसरों की नजरों में हेय कहलाएँगे। फिर इसका क्या गारंटी है कि माँगी हुई चीज मिल ही जाएगी। गारंटी भी नहीं है फिर क्यों बेवजह पापड़ बेलेँ? आप ऐसा क्यों नहीं कर सकते कि देने की ही बात पर विचार करें। देने में आप पूरी तरह समर्थ हैं। आप सद्भावना दे सकते हैं, सेवा के लिए कहीं न कहीं से समय निकाल सकते हैं।

आप ऐसा कीजिए कि दानी बनिए और याचक का चोला नीचे पटक दीजिए। आप मालिक नहीं माली हो कर रहिए। मालिक होकर रहेंगे तो बहुत हैरान होंगे। यकीन मानिए, मालिक को इतनी हैरानी, इतनी चिंता रहती है जिसका कोई ठिकाना नहीं; लेकिन माली? माली को दिन भर बगीचे में मेहनत करनी पड़ती है और हैरानी का नाम नहीं। क्यों? क्योंकि वह समझता है कि यह बगीचा किसी और है, मालिक का है और हमारा फर्ज है, हमारी ड्यूटी है, कि इस बगीचे को अच्छे से अच्छा रखें। माली सिंचाई करता है, गुड़ाई करता है, निराई करता है, जो कर सकता है करता है। आप सिर्फ अपने फर्ज और कर्तव्य तक अपना रिश्ता रखिए, आप परिणामों पर विचार करना बंद कर दीजिए, क्योंकि परिणामों के बारे में आप कोई गारंटी नहीं दे सकते। आप जैसी परिस्थितियाँ चाहते हैं वे मिल जाएँगी, इसकी कोई गारंटी नहीं। नहीं, हम मेहनत करेंगे। तब भी गारंटी नहीं! आप इम्तहान में पास हो जाएँगे, कोई जरूरी नहीं। आप मेहनती हैं तब भी हो सकता है आप फेल हो जाएँ। आप व्यापार में कुशल हैं फिर भी तब भी संभव है आपको नुकसान हो जाए। आप बहुत चौकस रहते हैं लेकिन फिर भी संभव है आप को बीमारियाँ पकड़ लें, चोर आदि आपका नुकसान कर दें। परिणामों के बारे में आप कुछ नहीं कर सकते। जो परिणाम आपके हाथ में, फिर आप ऐसा क्यों करेंगे कि उनके बारे में इतना लालच करें और अपनी शांति खो बैठें। आप केवल कर्तव्य की बात सोचिए, केवल माली की तरह सोचिए, मालिक की बात खत्म, अधिकार की बात खत्म। कर्तव्य आपके हाथ में हैं, अधिकार दूसरों के हाथ में। आप अधिकार को लौंग मानिए और अपने कर्तव्यों को, जिम्मेदारी को इससे सुगंधित कीजिए।

Monday, April 4, 2011

हमारा नववर्ष

आप सभी को नववर्ष (विक्रम संवत्सर 2068) की हार्दिक शुभकामनाएँ।
विलम्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ।

Sunday, April 3, 2011

हम जीत गए!!!

वाह! क्या रोमांचक क्षण है। एक लंबे अंतराल एवं इंतजार के पश्चात हम क्रिकेट का विश्व कप जीतने में सफल हुए हैं। पहली बार जब भारत ने 1983 में विश्व कप जीता था तब तो मैं काफी छोटा था और उसकी धूमिल सी याद भी नहीं आती है, लेकिन इस बार का रोमांच शायद मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। आप सभी को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाइयाँ।
अभी मेरे पास टेलीविजन नहीं था लेकिन तकनीकी विकास आज इस स्तर पर पहुँच गया है कि आप के पास विकल्प काफी रहते हैं। मुझे भी इसका लाभ मिला। मैंने अपने मोबाइल पर इंटरनेट के विश्व कप के प्रत्येक मैच के एक- एक क्षण को अनुभव किया। पाकिस्तान के साथ हुआ मैच मुझे दो कारणों से विशेष लगा। एक- भारत इस जीत के बाद विश्व कप के फाइनल में पहुँच जाता; और दो- हम कितनी कड़वाहट और द्वेष भरे बैठे हैं अपने दिलों में अपने पड़ोसियों के प्रति। कुछ लोगों का धार्मिक उन्माद, कुछ लोगों का राजनीतिक स्वार्थ किस तरह हम पर हावी हो गया है। काश, सीमा के दोनों तरफ हमें अपने बिछड़े भाइयों की यादें इतना बेचैन कर देतीं कि हम दौड़े चले जाते उनसे गले मिलने और फिर से भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश एक हो जाते। मुझे ऐसा आभास होता है कि ऐसा भविष्य में होने वाला है। मैं आप सभी से इस संभावना पर राय जानना चाहूँगा।
धन्यवाद।

Saturday, April 2, 2011

कायाकल्प का मर्म और दर्शन, भाग- 1

<पूज्यवर की अमृतवाणी (भाग एक), पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय से उध्धरित>

देवियोँ! भाइयों!!
बात कायाकल्प की चल रही थी। आप कल्प की इच्छा के लिए आए हैं न! कल्प में आपके सारे शरीर को बदलना तो संभव नहीं है; पर आपका मन बदल सकता है, आपका स्तर बदल सकता है, आपका भविष्य बदल सकता है। आपका भूतकाल जो कि घिनौना भूतकाल, खाली हाथ वाला भूतकाल, चिंताजनक स्थितियों वाला भूतकाल है, वह ऐसे उज्ज्वल भविष्य में बदल सकता है, जिसकी आपने कभी कल्पना नहीं की होगी। भूतकाल कैसा रहा है? आपको अपनी आँख से कैसा दिखता है? क्या कहूँ मैं आपसे! आपने अपना मकान बना लिया, लड़कों के लिए धन एकत्र कर दिया, लड़कियों की शादी में ढेरों पैसा खर्च कर दिया। अगर आप इन्हीं बातों को अपनी सफलता की निशानी मानते हैं; तो मानते रहिए, मैं कब कहता हूँ कि ये सफलताएँ नहीं हैं; लेकिन मेरी दृष्टि में ये सफलताएँ नहीं हैं। आपकी सफलता रही होती तब जब आप दूसरे नानक रहे होते, कबीर रहे होते, रैदास रहे होते, विवेकानंद रहे होते, गाँधी हो गए होते, तो मैं आपके भूतकाल को शानदार मानता। लेकिन भूतकाल कैसा था? जानवरों का जैसा होता है- पेट भरते रहते हैं और बच्चे पैदा करते रहते हैं। वह भी तो आपका इतिहास है। पिछले दिनों आपने क्या किया? बताइए? एक तो आपने पेट भरा और दूसरे औलाद पैदा की है। औलाद की जिम्मेदारियाँ सर पे आएँगी ही और आपको वहन करना ही पड़ेगा। जब आपने गुनाह किया है तो उसकी सजा भी आपको भुगतनी ही पड़ेगी। आपने बच्चे पैदा किए हैं न, तब सजा भी भुगतिए। सारी जिंदगी भर उनके लिए कमाइए, कोल्हू के बैल की चलिए, पीसिए अपने आपको और उनको खिलाइए; क्योंकि गुनाह तो आपने किया ही है। एक औरत को हैरान किया है न, बेचारी नौ महीने पेट में वजन रखा, कष्ट सहे, छाती का दूध पिलाया, फिर आप क्यों नहीं कष्ट सहेँगे? आप भी कोल्हू में चलिए, आपको भी बीस साल की कैद होती है। बीस साल का बच्चा न हो जाए तब तक आप कैसे पीछा छुड़ा पाएँगे? यही तो भूतकाल है आपका! यही तो आपकी परिणति है। यही तो आपने पुरुषार्थ किया है। कोई ऊँचे स्तर से विचार करेगा तो आपके भूतकाल को कैसे प्रोत्साहित करेगा?

अब आप अपने भविष्य को ऐसा मत बनाइए। भविष्य को आप ऐसा बनाइए कि जब तक आप रहें, तब तक संतोष करते रहें और जब नहीं रहें तो आपके पद चिन्होँ पर चलते हुए दूसरे आदमी भी रास्ता तलाश कर सकें। गाँधीजी ने राजकोट में राजा हरिश्चन्द्र की कहानी देखी और उस छोटे बच्चे गाँधी के मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने उसी दिन फैसला कर लिया कि अगर जिउँगा तो हरिश्चन्द्र हो कर जिउँगा। उज्ज्वल भविष्य और उसके संकल्प ऐसे ही तो होते हैं। संकल्पों से उन्होंने क्या से क्या कर डाला। आपको ऐसे संकल्पों को चरितार्थ करने के लिए यहाँ सहारा भी है। आप कैसे सौभाग्यशाली हैं! आपको तो सहारा भी मिल गया। आमतौर पर लोग अकेले ही चलते हुए मंजिल पार करते हैं, पर आपको तो अकेले चलने के साथ लाठी का सहारा भी है। आप इस सहारे का लाभ क्यों नहीं लेते? आम लोग पैदल सफर करते हैं पर आपके लिए तो सवारी भी तैयार खड़ी है। फिर आप लाभ क्यों नहीं उठाते? शान्तिकुंज* के वातावरण को केवल आप यह मत मानिए कि यहाँ दीवारें ही खड़ी हुईँ हैं, आप यह मत सोचिए कि यहाँ शिक्षण का कुछ क्रम ही चलता रहता है, यह मत सोचिए कि यहाँ कुछ व्यक्ति विशेष ही रहते हैं। आप यह भी मानकर चलिए कि यहाँ एक ऐसा वातावरण आपके पीछे पीछे लगा हुआ है, जो आपकी बेहद सहायता कर सकता है। उस वातावरण से निकली प्राण की कुछ धाराओं को, जिसने खींचकर आपको यहाँ बुलाया है और आप जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, उस वातावरण, प्रेरणा और प्रकाश को चाहें तो आप एक नाम यह भी दे सकते हैं- पारस।

पारस उस चीज का नाम है, जिसे छू कर लोहा भी सोना बन जाता है। आप लोहा रहे हों पहले से, पर इस समय आप सोना बनने की परिस्थितियों में हैं। आप के पास एक पारस है, जिसको आप छुएँ, तो देख सकते हैं कि किस तरह आप की काया बदलती है। आप अभावग्रस्त दुनिया में भले ही रहे हों पहले से, आपको सारी जिंदगी यह कहते रहना पड़ा हो कि हमारे पास कमियाँ बहुत हैं, अभाव बहुत हैं, कठिनाइयाँ बहुत हैं; लेकिन यहाँ एक ऐसा कल्प वृक्ष विद्यमान है जिसका आप सच्चे अर्थों में सहारा लें, तो आपकी कमियाँ, अभावों और कठिनाइयों में से एक भी जिंदा रहने वाली नहीं हैं। कल्प वृक्ष कोई पेड़ होता है या नहीं, मैं नहीं जानता। न मैंने कल्प वृक्ष देखा है और न मैं आपको कल्प वृक्ष के सपने दिखाना चाहता हूँ। लेकिन अध्यात्म के बारे में मैं यकीनन कह सकता हूँ कि यह एक कल्प वृक्ष है। अध्यात्म कर्मकाण्डोँ को नहीं, दर्शन को कहते हैं, चिंतन को कहते हैं। जीवन में परिवर्तन कर सके, ऐसी प्रेरणा और प्रकाश का नाम है अध्यात्म। ऐसा अध्यात्म अगर आपको मिल रहा हो या यहाँ मिल जाए या मिलने की जो संभावनाएँ हैं, उससे आप लाभ उठा लें, तो आप यह कह सकेंगे कि हमको कल्प वृक्ष के नीचे बैठने का मौका मिल गया है।

आपको रोज मरने की चिंता होती है न, मरने वाले प्राणी जिस तरह अपनी हविश को पूरा करने के लिए, अपना पेट भरने के लालायित रहते हैं, आपको वैसा कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। दीर्घजीवियोँ के तरीके से आप हमेशा जिंदा रहेंगे, आपकी कभी मौत नहीं होगी। जो कभी नहीं मरते उन्हें कालजयी कहते हैं। आप भी कालजयी हो सकते हैं- कब? जब आप अमृत पिएँ, तब। शरीर को जिंदा रखने वाला अमृत कभी रहेगा तो दुनिया में प्रकृति के नियम खत्म हो जाएँगे। कौन दिखाई पड़ता है बताइए? भगवान श्रीराम कहीं दिखाई पड़ते हैं? भगवान श्रीकृष्ण कहीं दिखाई पड़ते हैं? हनुमान जी की शक्ल देखी है आपने? जब इतने बड़े बड़े महापुरुष और भगवान के अवतार दुनिया में सशरीर नहीं रहे, तो और कौन रहेगा? अगर अमृत कहीं रहा होता तो इन लोगों ने अवश्य पी लिया होता। पर अध्यात्म एक अमृत है जिसे पीकर, आप अमर हो सकते हैं; एक कल्प वृक्ष है, जिसके नीचे बैठकर आप अपना कायाकल्प कर सकते हैं। यह अध्यात्म ज्ञान है और जिस दिन आपको यह बोध हो जाएगा कि हम...
क्रमशः॥
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