Saturday, March 26, 2011

मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान- 3

मित्रों! भगवान जब प्रसन्न होते हैं तो वह चीज नहीं देते जो आप माँगते हैं। फिर क्या चीज देते हैं? वह चीज देते हैं जिससे आदमी अपने बलबूते पर खड़ा हो जाता है और चारों ओर से उसको सफलताएँ मिलती हुई चली जाती है। सारे के सारे महापुरुषों को आप देखिए, कोई भी आदमी दुनिया के पर्दे पर आज तक ऐसा नहीं हुआ है, जिसको दैवीय सहयोग न मिला हो, जिसको जनता का सहयोग न मिला हो, जिसको भगवान का सहयोग न मिला हो। ऐसे एक भी आदमी का नाम आप बताइए जिसके अंदर से वे विशेषताएँ पैदा न हुई हों, जिनसे आप दूर रहना चाहते हैं, जिनसे आप बचना चाहते हैं। जिनके प्रति आपका कोई लगाव नहीं है। वह चीजें जिनको हम आशीर्वाद कहते हैं, सिद्धांतवाद कहते हैं। दुनिया के हिस्से का हर आदमी जिसको श्रेय मिला हो, धन भी मिला है। जहाँ आदमी को श्रेय मिलेगा वहीँ उसे वैभव भी मिले बिना रहेगा नहीं। संत गरीब नहीं होते। वे उदार होते हैं और जो पाते हैं- खाते नहीं, दूसरों को खिला देते हैं। देवत्व इसी को कहते हैं।

आदमी के भीतर का माद्दा जब विकसित होता है तो बाहरी दौलत उसके नजदीक बढ़ती चली जाती है। उदाहरण क्या बताऊं- प्रत्येक सिद्धांतवादी का यही उदाहरण है। उन्हीं को मैं देव भक्त कहता हूँ। देव उपासक उन्हीं को मैं कहता हूँ। उन्हीं की देव भक्ति को मैं सार्थक मानता हूँ जो अपने गुणों के आकर्षण के आधार पर देवता को अपने आकर्षण में खींच सकने में समर्थ हुए। आपकी भाषा में कहूँ तो देवता जब प्रसन्न होते हैं तो आदमी को देव तत्व के गुण देते हैं, देवत्व के कर्म देते हैं, देवत्व का चिंतन देते हैं और देव तत्व का स्वभाव देते हैं। यह मैंने आपकी भाषा में कहा है। हमारी परिभाषा इससे अलग है। मैं यह कह सकता हूँ कि आदमी अपने देवत्व के गुणों के आधार पर देवता को मजबूर करता है, देवता पर दबाव डालता है उसे विवश करता है और यह कहता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए और सहायता करनी पड़ेगी। भक्त इतना मजबूत होता है जो भगवान के ऊपर दबाव डालता है और कहता है कि हमारा 'ड्यू' है। आप हमारी सहायता क्यों नहीं करते? वह भगवान से लड़ने को आमादा हो जाता है कि हमारी सहायता करनी चाहिए।

कामना करने वाले भक्त नहीं हो सकते। भक्त शब्द के साथ में भगवान की इच्छाएँ पूरी करने की बात जुड़ी रहती है। कामना पूर्ति आपकी नहीं भगवान की। भक्त की रक्षा करने का भगवान व्रत लिए हैं- 'योगक्षेमं वहाम्यहम्‌'। यह सही है कि भगवान ने योग क्षेम को पूरा करने का व्रत लिया है, पर हविश पूरी करने का जिम्मा नहीं लिया। आपका योग और क्षेम अर्थात आपकी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना उनकी जिम्मेदारी है। आपकी बौद्धिक, मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना भगवान की जिम्मेदारी है, पर आपकी हविश पूरी नहीं हो सकती। हविशोँ के लिए, तृष्णाओँ के लिए भागिए मत। यह भगवान की शान में, भक्त की शान में, भजन की शान में गुस्ताखी है, सबकी शान में गुस्ताखी है। भक्त और भगवान का सिलसिला इसी तरह से चलता रहा है और इसी तरीके से चलता रहेगा। भगवान माँगते नहीं दिया करते हैं। भगवान कोई इंसान नहीं हैं, उसे तो हमने बना लिया है। भगवान वास्तव में सिद्धांतों का समुच्चय हैं, आदर्शों का नाम है, श्रेष्ठता के समुच्चय का नाम है। सिद्धांतों के प्रति, आदर्शों के प्रति आदमी के जो त्याग और बलिदान हैं वस्तुतः यही भगवान की भक्ति है। देवत्व इसी का नाम है।

प्रामाणिकता आदमी की इतनी बड़ी दौलत है कि जनता का उस पर सहयोग बरसता है, स्नेह बरसता है, समर्थन बरसता है। जहाँ स्नेह, समर्थन और सहयोग बरसता है, वहाँ आदमी के पास किसी चीज की कमी नहीं रह सकती। बुद्ध की प्रमाणिकता के लिए, सद्भावना के लिए, उदारता के लिए लोगों ने उनके ऊपर पैसे बिखेर दिए। गाँधीजी की प्रामाणिकता और सद्भावना, श्रेष्ठ कामों के लिए; उनकी लगन, उदारता लोकहित के लिए थी। व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को लेकर चलने पर वे भक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होते चले गए। सारे समाज ने उनको सहयोग दिया, दान दिया और उनकी आज्ञा का पालन किया। लाखों लोग उनके कहने पर जेल चले गए और अपने सीने पर गोलियाँ खाईँ। क्या यह हो सकता है? हाँ! शर्त एक ही है कि आप प्रकाश की ओर चलें, छाया अपने आप आपके पीछे- पीछे चलेगी। आप तो छाया के पीछे भागते हैं, छाया ही आप पर हावी हो गई है। छाया का अर्थ है- माया। आप प्रकाश की ओर चलिए, भगवान की ओर चलिए, सिद्धांतों की ओर चलिए। आदर्श और सिद्धांत इन्हीं का नाम हनुमान है, इन्हीं का नाम भगवान है।

मित्रों! जो हविश आपके ऊपर हावी हो गई है उससे पीछे हटिए, तृष्णाओँ से पीछे हटिए और उपासना के उस स्तर पर पहुँचने की कोशिश कीजिए जहाँ कि आपके भीतर से, व्यक्तित्व में से श्रेष्ठता का विकास होता है। भक्ति यही है। अगर आपके भीतर श्रेष्ठता का विकास हुआ है, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको जनता का वरदान मिलेगा। चारों ओर से इतने वरदान मिलेंगे कि आप निहाल हो जाएँगे। भक्ति का यही इतिहास है, भक्त का यही इतिहास है। भक्त के अनुग्रह का यही इतिहास है। आप यह समझ लें कि आपको सद्गुणोँ का विकास करने की तपस्या करनी है और भगवान हमको गुण, कर्म और स्वभाव की विशेषता देंगे और हमें चरित्रवान व्यक्ति के रूप में विकसित करेंगे। चरित्रवान व्यक्ति जब विकसित होता है तो उदार हो जाता है, परमार्थ- परायण हो जाता है, लोकसेवी हो जाता है, जनहितकारी हो जाता है और अपने क्षुद्र स्वार्थ छोड़ देता है। यदि आपकी ऐसी मनःस्थिति हो जाए तो समझना चाहिए कि आपने सच्ची उपासना की और वरदान पाया।

मैं चाहता था कि आपलोग यह प्रेरणा लेकर जाएँ कि भगवान हम पर कृपा करें कि श्रेष्ठता के लिए, आदर्शों के लिए कुछ त्याग और बलिदान करने की, चरित्रवान बनने की शक्ति मिले। यदि ऐसा हुआ तो उसके फलस्वरूप आप जो कुछ भी प्राप्त करेंगे, वह इतना शानदार होगा कि आप निहाल हो जाएँ, आपका देश निहाल हो जाए और हम निहाल हो जाएँ।
आज की बात समाप्त॥ ॐ शांति॥
अगली कड़ी में पढ़ें-
'कायाकल्प का मर्म और दर्शन'
धन्यवाद।
There was an error in this gadget