Saturday, March 12, 2011

स्वतंत्रता दिवस की बधाई!

दोस्तों यह ब्लॉग मैंने स्वतंत्रता दिवस पर लिखा था लेकिन तब मैं इसे प्रकाशित नहीं कर पाया था लेकिन आज जब मैं इसे पढ़ रहा था तो मुझे यह आज भी उतना ही प्रासंगिक लगा और मैं इसे अपने तक सीमित रख पाने का धैर्य नहीं रख पाया। इसी कारण से मैं इसे आज प्रकाशित कर रहा हूँ । 

आपको स्वतंत्रता दिवस की बधाई!
लेकिन क्या हम आज के दिन बधाई देने या लेने के योग्य रह पाए या कहिए बन पाए हैं? लेकिन यह भी एक सत्य, कटु सत्य है कि हम इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते। हमारे देश में अंग्रेजोँ से आजादी के बाद से अभी तक कभी भी नागरिकों की कद्र नहीं रही। हमारे नीति निर्माताओं ने जाने अनजाने गैर नागरिक तत्वों को बल एवं सुरक्षा प्रदान किया है। आम नागरिक के लिए अपना उचित अधिकार पाना भी दिन पर दिन दुभर होता जा रहा है जबकि तथाकथित संविधान के विरुद्ध जाकर आचरण करने वालों के लिए अपनी अनुचित माँगें भी पूरी करा लेने के उदाहरण बढ़ते जा रहे हैं। सड़क जाम, रेल रोकने, सार्वजनिक संपत्तियोँ को नुकसान पहुँचाने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
आरक्षण का ऐसा जहर हमारे बीच बो दिया गया है जो हर एक बीते दिन के साथ गृह युद्ध की बुनियाद रख रहा है। आए दिन एक नया समुदाय अपने लिए आरक्षण की माँग कर रहा है। दरअसल कुल आरक्षण के बाद बची जगहों पर चयन के लिए लोग अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं कायम रख पा रहे हैं।
भाषाई आधार पर बनी दूरियोँ को कम करने के स्थान पर इतना गहरा कर दिया गया है जो हर आने वाले वर्ष में एक नए राज्य की सीमा तैयार कर रहा है। एक राज्य दूसरे राज्य के साथ सहयोग एवं सामंजस्य के द्वारा उन्नति करने के बजाय एक दूसरे को अपना शत्रु समझ रहे हैं। कोई भी ऐसे पड़ोसी राज्य नहीं हैं जिनमें किसी मुद्दे को लेकर विवाद न हो। जब कई देश आपस में संबंध सुधारने के प्रयास कर रहे हैं, ऐसा लगता है हमारी सीमाओं के भीतर ही कई देश बन गए हैं। हम अनेक छोटे देशों जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तिब्बत, इराक, ईरान आदि की हालत से सबक लेने को तैयार नहीं हैं।
परिवार की सीमाएँ छोटी होती जा रही हैं। एक ओर कार्य की विवशता से परिवार बिखर रहे हैं लेकिन इससे ज्यादा नुकसान भावनात्मक लगाव टूटने से हो रहा है। लोग रिश्तोँ को संभालने के बजाय उन पर से गुजरते हुए अपने लिए रास्ते तलाश रहे हैं। परिणाम स्वरूप बच्चों पर से उन अनुभवी हाथों का सहारा हटता जा रहा है जो उन्हें गलत सुरों को छेड़ने से पहले ही सँवार लेते थे। आज, अश्लीलता, नशे में जकड़े अनजान राहोँ पर चलते बच्चे एक चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
अशिक्षा, लगातार बढ़ती जनसंख्या, भ्रष्टाचार के नित नए आयाम, प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन, अमीरोँ एवं गरीबों में बढ़ता अंतर आदि कई अन्य बिंदु हैं जहाँ निराशा मिली है।
वस्तुतः अंग्रेजोँ ने जो शासन व्यवस्था बनाई हम कमोबेश उसी पर चलते रहे हैं। एक तो अंग्रेजोँ ने वह व्यवस्था अपने राज्य को सुदृढ़ एवं संपन्न बनाने के लिए की थी भले इसका कुछ भी प्रभाव स्थानीय लोगों पर पड़ता हो। दूसरे, ब्रिटेन या अमेरिका जैसे देशों से हमारी आवश्यकताएँ सर्वथा भिन्न हैं। यह सच है कि, आज हम उन्हीं अंग्रेजोँ द्वारा रखी बुनियाद पर चलते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं जिसमें आज की बहुमँजिला इमारतें, रेल गाड़ियाँ, डाक व्यवस्था, बैंकिंग क्षेत्र, आधुनिक सैन्य व्यवस्था आदि बहुत से अन्य आयाम शामिल हैं।
लेकिन यह भी सच है कि इनमे से अधिकतर सुविधाएँ हमारी मज़बूरी हैं न कि हमारा चुनाव। व्यक्ति इन्हीं सुविधाओं में अपने जीवन के वास्तविक मूल्य खोज रहा है और इन्हीं मशीनों के जैसे व्यवहार कर रहा है। आज व्यक्ति इन सुविधाओं पर नियत्रण रखने और नियंत्रण करने कि बजाए खुद उनके नियंत्रण में होता जा रहा है।  हम एक जबरदस्त भंवर में फंसते जा रहे हैं जिसमें हम नौकरी की (जी हाँ नौकरी की!) शिक्षा पाते हैं फिर अपने बच्चों को वही शिक्षा दिलाते हैं और ये क्रम कई पीढ़ियों से हमारे समाज में चल रहा है। हममें से बहुत कम लोग मौलिक स्तर पर कुछ सोच पाते हैं या कर पाते हैं। हमें इन समस्याओं के समाधान शीघ्र खोजने होंगे।

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