Thursday, August 4, 2011

सरकार के बजाए अपनी सुध लें

बिहार में और विशेषतः पटना में लोग अपनी जिम्मेदारियाँ जाने बगैर हर बात के लिए सरकार को दोष देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यदि मेट्रो से पटना की तुलना करना चाहते हैं तो नागरिक उत्तरदायित्वोँ को जानना एवं सीखना होगा। क्या हमने कोनोँ में थूकना बंद किया है? नहीं। क्या हमने सार्वजनिक जगहों को पेशाबघर समझना बंद किया है? नहीं। क्या हमने ऐसा करने वालों को टोकना शुरू किया है, नहीं। हम सड़क पर, घर के पीछे और हर ऐसी खाली जगह पर जहाँ कोई देख न रहा हो, कचरा फैलाते हैं और सफाई की बात करते हैं। पानी को बचाना नहीं जानते और पानी की कमी का रोना रोते हैं। राजधानी में रह कर भी बिजली चोरी को अपना अधिकार मानते हैं फिर बिजली के लिए सरकार को दोष देते हैं। महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में भी जो बिजली उत्पादन में देश में अव्वल है, शून्य विद्युत कटौती उन्हीं शहरों को मिल रही है जिनका बिल भुगतान का औसत शत प्रतिशत या उसके बहुत करीब है। हमलोग मुम्बई, चेन्नई, बंगलोर, हैदराबाद आदि शहरों में जाते हैं लेकिन क्या हम पंक्ति में रहकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करना सीख पाए हैं? नहीं, लेकिन हम व्यवस्था की बात करते हैं। सरकार को जितना करना चाहिए उससे अधिक कर रही है। अब यदि हम बिहार को विकसित देखना चाहते हैं तो जरूरी है कि हम अपने हिस्से का योगदान शुरू करें। 'अधिकारों का वह हकदार जिसको कर्तव्यों का ज्ञान'। और यदि नहीं तो जितना जी चाहे चिल्लाते रहो, जुगाड़ लगा कर लाइन के बाहर से अपना काम कराते रहो, आठ- दस घंटों की बिजली में इन्वर्टर की बैटरी चार्ज करते रहो, 'साइड इंकम' से अपना बैंक बैलेँस बढ़ाते रहो, दहेज देते और लेते रहो। राज और उद्धव ठाकरे जैसे लोगों को बिहार को बदनाम करते रहने दो- आपको क्या अंतर पड़ता है? लेकिन सड़क, बिजली, सफाई और व्यवस्था की बात कृपया मत करो।
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