Saturday, April 2, 2011

कायाकल्प का मर्म और दर्शन, भाग- 1

<पूज्यवर की अमृतवाणी (भाग एक), पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय से उध्धरित>

देवियोँ! भाइयों!!
बात कायाकल्प की चल रही थी। आप कल्प की इच्छा के लिए आए हैं न! कल्प में आपके सारे शरीर को बदलना तो संभव नहीं है; पर आपका मन बदल सकता है, आपका स्तर बदल सकता है, आपका भविष्य बदल सकता है। आपका भूतकाल जो कि घिनौना भूतकाल, खाली हाथ वाला भूतकाल, चिंताजनक स्थितियों वाला भूतकाल है, वह ऐसे उज्ज्वल भविष्य में बदल सकता है, जिसकी आपने कभी कल्पना नहीं की होगी। भूतकाल कैसा रहा है? आपको अपनी आँख से कैसा दिखता है? क्या कहूँ मैं आपसे! आपने अपना मकान बना लिया, लड़कों के लिए धन एकत्र कर दिया, लड़कियों की शादी में ढेरों पैसा खर्च कर दिया। अगर आप इन्हीं बातों को अपनी सफलता की निशानी मानते हैं; तो मानते रहिए, मैं कब कहता हूँ कि ये सफलताएँ नहीं हैं; लेकिन मेरी दृष्टि में ये सफलताएँ नहीं हैं। आपकी सफलता रही होती तब जब आप दूसरे नानक रहे होते, कबीर रहे होते, रैदास रहे होते, विवेकानंद रहे होते, गाँधी हो गए होते, तो मैं आपके भूतकाल को शानदार मानता। लेकिन भूतकाल कैसा था? जानवरों का जैसा होता है- पेट भरते रहते हैं और बच्चे पैदा करते रहते हैं। वह भी तो आपका इतिहास है। पिछले दिनों आपने क्या किया? बताइए? एक तो आपने पेट भरा और दूसरे औलाद पैदा की है। औलाद की जिम्मेदारियाँ सर पे आएँगी ही और आपको वहन करना ही पड़ेगा। जब आपने गुनाह किया है तो उसकी सजा भी आपको भुगतनी ही पड़ेगी। आपने बच्चे पैदा किए हैं न, तब सजा भी भुगतिए। सारी जिंदगी भर उनके लिए कमाइए, कोल्हू के बैल की चलिए, पीसिए अपने आपको और उनको खिलाइए; क्योंकि गुनाह तो आपने किया ही है। एक औरत को हैरान किया है न, बेचारी नौ महीने पेट में वजन रखा, कष्ट सहे, छाती का दूध पिलाया, फिर आप क्यों नहीं कष्ट सहेँगे? आप भी कोल्हू में चलिए, आपको भी बीस साल की कैद होती है। बीस साल का बच्चा न हो जाए तब तक आप कैसे पीछा छुड़ा पाएँगे? यही तो भूतकाल है आपका! यही तो आपकी परिणति है। यही तो आपने पुरुषार्थ किया है। कोई ऊँचे स्तर से विचार करेगा तो आपके भूतकाल को कैसे प्रोत्साहित करेगा?

अब आप अपने भविष्य को ऐसा मत बनाइए। भविष्य को आप ऐसा बनाइए कि जब तक आप रहें, तब तक संतोष करते रहें और जब नहीं रहें तो आपके पद चिन्होँ पर चलते हुए दूसरे आदमी भी रास्ता तलाश कर सकें। गाँधीजी ने राजकोट में राजा हरिश्चन्द्र की कहानी देखी और उस छोटे बच्चे गाँधी के मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने उसी दिन फैसला कर लिया कि अगर जिउँगा तो हरिश्चन्द्र हो कर जिउँगा। उज्ज्वल भविष्य और उसके संकल्प ऐसे ही तो होते हैं। संकल्पों से उन्होंने क्या से क्या कर डाला। आपको ऐसे संकल्पों को चरितार्थ करने के लिए यहाँ सहारा भी है। आप कैसे सौभाग्यशाली हैं! आपको तो सहारा भी मिल गया। आमतौर पर लोग अकेले ही चलते हुए मंजिल पार करते हैं, पर आपको तो अकेले चलने के साथ लाठी का सहारा भी है। आप इस सहारे का लाभ क्यों नहीं लेते? आम लोग पैदल सफर करते हैं पर आपके लिए तो सवारी भी तैयार खड़ी है। फिर आप लाभ क्यों नहीं उठाते? शान्तिकुंज* के वातावरण को केवल आप यह मत मानिए कि यहाँ दीवारें ही खड़ी हुईँ हैं, आप यह मत सोचिए कि यहाँ शिक्षण का कुछ क्रम ही चलता रहता है, यह मत सोचिए कि यहाँ कुछ व्यक्ति विशेष ही रहते हैं। आप यह भी मानकर चलिए कि यहाँ एक ऐसा वातावरण आपके पीछे पीछे लगा हुआ है, जो आपकी बेहद सहायता कर सकता है। उस वातावरण से निकली प्राण की कुछ धाराओं को, जिसने खींचकर आपको यहाँ बुलाया है और आप जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, उस वातावरण, प्रेरणा और प्रकाश को चाहें तो आप एक नाम यह भी दे सकते हैं- पारस।

पारस उस चीज का नाम है, जिसे छू कर लोहा भी सोना बन जाता है। आप लोहा रहे हों पहले से, पर इस समय आप सोना बनने की परिस्थितियों में हैं। आप के पास एक पारस है, जिसको आप छुएँ, तो देख सकते हैं कि किस तरह आप की काया बदलती है। आप अभावग्रस्त दुनिया में भले ही रहे हों पहले से, आपको सारी जिंदगी यह कहते रहना पड़ा हो कि हमारे पास कमियाँ बहुत हैं, अभाव बहुत हैं, कठिनाइयाँ बहुत हैं; लेकिन यहाँ एक ऐसा कल्प वृक्ष विद्यमान है जिसका आप सच्चे अर्थों में सहारा लें, तो आपकी कमियाँ, अभावों और कठिनाइयों में से एक भी जिंदा रहने वाली नहीं हैं। कल्प वृक्ष कोई पेड़ होता है या नहीं, मैं नहीं जानता। न मैंने कल्प वृक्ष देखा है और न मैं आपको कल्प वृक्ष के सपने दिखाना चाहता हूँ। लेकिन अध्यात्म के बारे में मैं यकीनन कह सकता हूँ कि यह एक कल्प वृक्ष है। अध्यात्म कर्मकाण्डोँ को नहीं, दर्शन को कहते हैं, चिंतन को कहते हैं। जीवन में परिवर्तन कर सके, ऐसी प्रेरणा और प्रकाश का नाम है अध्यात्म। ऐसा अध्यात्म अगर आपको मिल रहा हो या यहाँ मिल जाए या मिलने की जो संभावनाएँ हैं, उससे आप लाभ उठा लें, तो आप यह कह सकेंगे कि हमको कल्प वृक्ष के नीचे बैठने का मौका मिल गया है।

आपको रोज मरने की चिंता होती है न, मरने वाले प्राणी जिस तरह अपनी हविश को पूरा करने के लिए, अपना पेट भरने के लालायित रहते हैं, आपको वैसा कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। दीर्घजीवियोँ के तरीके से आप हमेशा जिंदा रहेंगे, आपकी कभी मौत नहीं होगी। जो कभी नहीं मरते उन्हें कालजयी कहते हैं। आप भी कालजयी हो सकते हैं- कब? जब आप अमृत पिएँ, तब। शरीर को जिंदा रखने वाला अमृत कभी रहेगा तो दुनिया में प्रकृति के नियम खत्म हो जाएँगे। कौन दिखाई पड़ता है बताइए? भगवान श्रीराम कहीं दिखाई पड़ते हैं? भगवान श्रीकृष्ण कहीं दिखाई पड़ते हैं? हनुमान जी की शक्ल देखी है आपने? जब इतने बड़े बड़े महापुरुष और भगवान के अवतार दुनिया में सशरीर नहीं रहे, तो और कौन रहेगा? अगर अमृत कहीं रहा होता तो इन लोगों ने अवश्य पी लिया होता। पर अध्यात्म एक अमृत है जिसे पीकर, आप अमर हो सकते हैं; एक कल्प वृक्ष है, जिसके नीचे बैठकर आप अपना कायाकल्प कर सकते हैं। यह अध्यात्म ज्ञान है और जिस दिन आपको यह बोध हो जाएगा कि हम...
क्रमशः॥

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