Sunday, May 11, 2014

लोकसभा आम चुनाव २०१४

भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्वों में से एक लोकसभा आम चुनाव का २०१४ का संस्करण अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। इस संस्करण की कई बातें काफी समय तक याद रहेंगी। इनमें अपने नेताओं की बदजुबानी, राजनीतिक दलों में गुंडागर्दी की बढती प्रवृत्ति के साथ लोगों में बढती जागरूकता और अपने अपने भविष्य के प्रति बढती सजगता कुछ मुख्य बिंदु हैं। लेकिन मेरे लिए यह चुनाव दो प्रमुख कारणों से विशेष  रहेगा। एक इस चुनाव को मैंने बहुत करीब से महसूस किया और दूसरा इस चुनाव रूपी लोकतांत्रिक महापर्व में न सिर्फ मैंने भाग लिया बल्कि इसके सफल आयोजन में भी मैंने अपना योगदान दिया- एक चुनाव कर्मी के रूप में।
वैसे तो चुनावों को मैं श्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से और उत्तर प्रदेश में श्री कल्याण सिंह के दौर से याद कर पा रहा हूँ लेकिन तब मैं एक विद्द्यार्थी था और मैंने अपने गाँव से बाहर का भारत बहुत कम देखा था। राजनीति की समझ भी देश प्रेम, विकास और कुछ चुनिन्दा शब्दों तक ही सीमित था। लेकिन चुनावों के बाद श्री वाजपेयी की सरकार दौरान मैंने यह काफी शिद्दत से महसूस किया कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो सकारात्मक बदलाव काफी सहज हो जाते हैं। मैंने श्री नितीश कुमार को रेल मंत्री के रूप में भारत के रेलवे भर्ती बोर्ड में आमूल चूल बदलाव करते हुए महसूस किया जिसने तब विभिन्न रेलवे भर्ती बोर्ड में जड़ों तक व्याप्त भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम या मैं कहूँ तो नगण्य कर दिया और मेरे जैसे सैकड़ो युवाओं को भारतीय रेल में अपना रोजगार पाने में सफलता मिल सकी। उत्तर प्रदेश में मैंने श्री कल्याण सिंह को वहाँ की शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए देखा। मैंने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि अध्यापक अपनी कक्षाओं में नियमित रूप से उपस्थित रहने लगे थे जो  मेरे जैसे युवक जो कोचिंग कक्षाओं में जाने में सक्षम नहीं थे, के लिए काफी लाभदायक रहने वाली थी लेकिन दुर्भाग्य से श्री कल्याण सिंह को इसी मुद्दे पर अगले चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा और श्री मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री बनते ही अपने वादे के मुताबिक नक़ल अध्यादेश को समाप्त कर दिया जो हमारे लिए और समग्र रूप से पूरे उत्तर प्रदेश कि शिक्षा व्यवस्था के लिए काफी नुकसानदेह साबित हुआ। मैंने महसूस किया कि किस तरह ये नेता सत्ता हासिल करने के लिए विकास के वास्तविक स्वरुप के लिए जनता को दूरदृष्टि देने की बजाय क्षुद्र और अल्पकालीन लाभों का  लालच देते हैं।  यदि मैं स्पष्ट कहूँ तो दरअसल मैं तभी से समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव का विरोधी हो गया। समाज वादी पार्टी का वही दृष्टिकोण अब पुनः तब स्पष्ट हो गया जब मुलायम सिंह यादव ने वोट पाने के लिए बलात्कार जैसे अपराध को छोटा बता दिया। इससे देश में बढ़ते अपराधों का कारण भी अधिक स्पष्ट होता है। वैसे भी समाज वादी पार्टी अपने शासन के लिए कम अपनी गुंडागर्दी के लिए ही ज्यादा मशहूर थी कम से कम मेरी नज़रों में। मैंने उनके तत्कालीन नेता और विधायक श्री विक्रम सिंह की हफ्ता वसूली और दादागिरी के बारे में काफी सुना था। सन २००० के बाद मैं रोजगार के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के अपने गाँव से बाहर निकला। और तब मुझे देश की वास्तविक तस्वीर दिखनी शुरू हुई।
इस चुनाव को मैंने काफी करीब से महसूस किया। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि श्री अरविन्द केजरीवाल के राजनीति में आने और आम आदमी पार्टी के गठन ने मुझे बहुत प्रभावित किया।  मैंने अपने अन्दर कुछ घटित होते हुए महसूस किया। इससे पहले श्री एना हजारे के आन्दोलन को मैंने देखा और आज के भारत में आंदोलनों की सीमाओं को महसूस किया। श्री केजरीवाल के राजनीति में आने से पहले ही मुझे यह निश्चय हो गया था कि सिर्फ आंदोलनों से परिस्थितियाँ बदली नहीं जा सकती हैं। आंदोलनों से हम याचक बन जाते हैं जो मुझे किसी भी स्थिति में सह्य नहीं है। मैं यह विश्वास करता हूँ कि जो किसी का हक़ है वह उसे मांगने कि जरुरत नहीं पड़नी चाहिए और जिसका मुझे अधिकार नहीं है वह मुझे मांगने कि जरुरत नहीं है। और जब तक ऐसा नहीं है विकास नहीं कहा जा सकता। हमारे परंपरागत भारतीय समाज में तो यहाँ तक प्रचलित है कि बच्चा भी जब तक रोता नहीं है तब तक माँ उसे दूध नहीं पिलाती है। हमारी इसी आस्था के कारण जिसे देखो हाथ फैलाये मांगने चला आता है। बच्चा रोने के अलावा कुछ कर नहीं सकता इसलिए रोता है। लेकिन हम रोने से आगे भी बहुत कुछ कर सकते हैं। आज के भारत में आन्दोलन करना महज रोने के जैसा ही है, मुद्दा चाहे जो हो। और मांगने पर तो भीख नहीं मिलती! जब आप मांगने पर उतर आते हैं तो गलत सही का फैसला देने वाले के हाथ में आ जाता है यानि देने वाला सही समझेगा तो देगा और देने वाला गलत समझेगा तो नहीं देगा। यहीं से हमारी राजनीति का आपराधीकरण और स्तरहीनता का प्रारंभ होता है। यहीं से हमारी राजनीति में देने वाला अपने को दाता और शासक समझने लगता है और आन्दोलन करने वाला अपने को प्रजा समझने लगता है जिसके किसी मूल्य का कोई मूल्य नहीं है लेकिन उसको हर मांग के लिए आन्दोलन करने का हक़ है। मैं आन्दोलन करने के विरूद्ध नहीं हूँ लेकिन मैं परिस्थितियां बदलने में विश्वास करता हूँ। मैं यह मानता हूँ कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक का स्वतंत्र अस्तित्व है, और हर नागरिक को उसकी मूलभूत आवश्यकताओं को प्राप्त करने के समान अधिकार हैं। इस अधिकार में किसी भी स्थिति में किसी के साथ भी भेद भाव नहीं किया जा सकता है। इस अधिकार में जीवन का अधिकार (चिकित्सा के साथ), अपने विकास का अधिकार (शिक्षा के साथ) और सामाजिक समानता का अधिकार मुख्य हैं। इसके साथ लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को उसके किये अपराधों के लिए उसके रुतबे, पद और आर्थिक सम्पन्नता के आधार पर भी कोई भेद भाव नहीं हो सकता। क्या हमारे भारत में ऐसा है? मुझे ऐसा महसूस नहीं हुआ। आज भारत में आपको बहु- स्तरीय भेद भाव दिखाई देंगे। हमें इसे बदलना ही होगा लेकिन समस्या यह है कि नागरिकों के लिए यह कोई समस्या है ही नहीं। पिछले कई दशकों से नागरिक, नागरिकों की बजाय प्रजा की तरह रह रहे हैं और उसे इन्होंने मानक के तौर पर स्वीकार करना सीख लिया है। लेकिन श्री अरविन्द केजरीवाल के राजनीति में आने के बाद ये स्थितियाँ कुछ बदली हैं और यही हमारे परंपरागत राजनीति दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। लोकसभा आम चुनाव २०१४ में मैंने बिहार के एक गाँव में मतदान अधिकारी - I की भूमिका में काम किया और मुझे यह देख सुखद आश्चर्य हुआ कि लोग अब राजनीतिक दलों की आवश्यकता और अपने समाज में उनकी भूमिका को ज्यादा सही समझ पा रहे हैं। मतदान के दौरान मैंने लोगों ने मुझसे कहा कि ये राजनेता तो चाहे किसी दल के हों पाँच वर्षों में कुछ ही बार हमारे पास आते हैं लेकिन हमें रहना तो अपने पड़ोसियों के साथ ही है। लोग अब पहले की तरह इन राजनीतिज्ञों के लिए कुछ भी कर गुजरने  के लिए दीवाने नहीं हैं। यह बदलाव निश्चित रूप से अभी बहुत छोटे स्तर पर हैं लेकिन एक चिन्तक ने बहुत सही कहा है कि समाज में जिस कुरीति पर लोग बात करना कम कर देते हैं वह कुरीति ज्यादा दिन नहीं रह सकती और समाज में जिस बदलाव के विषय में लोग बात नहीं कर सकते वह बदलाव समाज में हो नहीं सकता।

Wednesday, March 26, 2014

फरवरी २००८ के वो दिन

जिन्दगी में कई घटनाएँ भुलाई नहीं जा सकतीं। इन्हीं में से  वो फरवरी २००८ की १३ तारीख है। मैं पटना पुणे एक्सप्रेस से खंडवा स्टेशन पहुँच रहा था जब मुझे पुणे, मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य स्थानों में शिवसेना के गुंडों द्वारा उत्तर भारतीयों के साथ मार-पीट की  सूचना अपने एक मित्र से फ़ोन पर मिली। खैर गाड़ी अगली सुबह पुणे स्टेशन पहुंची। मैं वह का दृश्य देख कर अवाक् था। मैं भारत पाकिस्तान विभाजन के समय हुई त्रासदी को हुबहू देख पा रहा था। पूरे स्टेशन पर अफरा तफरी का माहौल था। पुणे से वापस जाने वाले उत्तर भारतीय लोगों से स्टेशन अटा पड़ा था और वहाँ पाँव रखने की भी जगह नहीं थी। आरपीएफ के लोग स्टेशन परिसर में सुरक्षा देने की कोशिश कर रहे थे। किसी तरह कुछ मराठी दोस्तों की सहायता से मैं अपने किराये के मकान पर पहुँचा, वहां से ड्यूटी के लिया गया और वापस अगले दिन पुणे स्टेशन पर लोकल ट्रेन के लिए पास लेने गया। मैं अभी लाइन में ही था तभी शिवसेना के कुछ गुंडे हुडदंग मचाते हुए स्टेशन की तरफ आये। उत्तर भारतीयों में खौफ चरम पर पहुँच गया था और वे अपना सारा सामान, जूते- चप्पल और यहाँ तक कि कुछ लोग अपने बच्चों को वहीँ छोड़ कर जिसको जहाँ जगह मिली, भागने लगे। कितने ही लोग स्टेशन परिसर में लगी लोहे की रेलिंग पार करते हुए गिर गए और उन्हें चोटें आयीं। करीब आधे घंटे तक भगदड़ मची रही तब जाकर आरपीएफ और पुलिस ने मिलकर लोगों को आश्वस्त किया। ऐसी कई घटनाएँ अगले कुछ महीनों में हुईं। इन घटनाओं ने हमारे घटिया राजनीतिज्ञों कि मानसिकता को मेरे सामने पहली बार इतने प्रखर रूप में स्पष्ट किया।

Saturday, March 22, 2014

ये लो फिर आ गए हम!

दोस्तों पिछले कई महीनों से व्यस्तता इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि ब्लॉग लिखने जैसे रचनात्मक कार्यों के लिए समय निकलना बहुत कठिन हो गया है. इसके आलावा कुछ और भी कारण थे जिनकी वजह से ब्लॉग पढता तो था लेकिन लिखना बंद हो गया था जैसे मेरे मोबाइल पर गूगल के कई फीचर काम करना बंद कर दिए जिससे पेज ठीक से लोड नहीं हो पा रहे थे. इस बीच एक बार मेरा गूगल अकाउंट हैक हो गया था जिसकी वजह से मुझे मोबाइल सन्देश (sms) की दोहरी सुरक्षा वाली लॉग इन प्रणाली अपनानी पड़ी और मैं अपने नोकिया २६९० फ़ोन पर पहले की तरह ब्लॉग नहीं लिख सकता था. इसकी एक वजह ये भी थी कि मैं कंप्यूटर पर हिंदी टाइपिंग नहीं जनता हूँ और अभी अभी मैंने गूगल इनपुट टूल्स डाउनलोड किया है जिससे मैं ये ब्लॉग हिंदी में लिख पा रहा हूँ.  भला हो इस तकनीकी विकास का जिसने हमें अभिव्यक्ति  के इतने आयाम दिए.
उम्मीद है अब आपसे बात होती रहेगी.

Thursday, November 7, 2013

छठ पूजा

छठ पूजा

छठ पर्व या छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेशऔर नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलंवी भी मनाते देखे गए हैं।

हमारे देशमें सूर्योपासनाके लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ । मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होनेके कारण इसे छठ कहा गया है । यह पर्व वर्षमें दो बार मनाया जाता है । पहली बार चैत्रमें और दूसरी बार कार्तिकमें । चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले छठ पर्वको चैती छठ व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले पर्वको कार्तिकी छठ कहा जाता है । पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फलप्राप्तिके लिए यह पर्व मनाया जाता है । इस पर्वको स्त्री और पुरुष समानरूपसे मनाते हैं । छठ व्रतके संबंधमें अनेक कथाएं प्रचलित हैं; उनमेंसे एक कथाके अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुएमें हार गए, तब द्रौपदीने छठ व्रत रखा । तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवोंको राजपाट वापस मिल गया । लोकपरंपराके अनुसार सूर्य देव और छठी मइयाका संबंध भाई-बहनका है । लोक मातृका षष्ठीकी पहली पूजा सूर्यने ही की थी । छठ पर्वकी परंपरामें बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है । उस समय सूर्यकी पराबैगनी किरणें (ultra violet rays) पृथ्वीकी सतहपर सामान्यसे अधिक मात्रामें एकत्र हो जाती हैं । उसके संभावित कुप्रभावोंसे मानवकी यथासंभव रक्षा करनेका सामर्थ्य इस परंपरामें है । पर्वपालनसे सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभावसे जीवोंकी रक्षा संभव है । पृथ्वीके जीवोंको इससे बहुत लाभ मिल सकता है । सूर्यके प्रकाशके साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वीपर आती हैं । सूर्यका प्रकाश जब पृथ्वीपर पहुंचता है, तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है । वायुमंडलमें प्रवेश करनेपर उसे आयन मंडल मिलता है । पराबैगनी किरणोंका उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्वको संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोनमें बदल देता है । इस क्रियाद्वारा सूर्यकी पराबैगनी किरणोंका अधिकांश भाग पृथ्वीके वायुमंडलमें ही अवशोषित हो जाता है । पृथ्वीकी सतहपर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुंच पाता है । सामान्य अवस्थामें पृथ्वीकी सतहपर पहुंचनेवाली पराबैगनी किरणकी मात्रा मनुष्यों या जीवोंके सहन करनेकी सीमामें होती है । अत: सामान्य अवस्थामें मनुष्योंपर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पडता, बल्कि उस धूपद्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवनको लाभ ही होता है । छठ जैसी खगौलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वीके भ्रमण तलोंकी सम रेखाके दोनों छोरोंपर) सूर्यकी पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतहसे परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वीपर पुन: सामान्यसे अधिक मात्रामें पहुंच जाती हैं । वायुमंडलके स्तरोंसे आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदयको यह और भी सघन हो जाती है । ज्योतिषीय गणनाके अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मासकी अमावस्याके छ: दिन उपरांत आती है । ज्योतिषीय गणनापर आधारित होनेके कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया                                               

छठ पर्व किस प्रकार मनाते हैं ?                यह पर्व चार दिनोंका है । भैयादूज के तीसरे दिनसे यह आरंभ होता है । पहले दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दूकी सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है । अगले दिनसे उपवास आरंभ होता है । इस दिन रात में खीर बनती है । व्रतधारी रात में यह प्रसाद लेते हैं । तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं । अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं । इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्ज्य है । जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं । आजकल कुछ नई रीतियां भी आरंभ हो गई हैं, जैसे पंडाल और सूर्यदेवता की मूर्ति की स्थापना करना । उसपर भी रोषनाई पर काफी खर्च होता है और सुबह के अर्घ्यके उपरांत आयोजनकर्ता माईक पर चिल्लाकर प्रसाद मांगते हैं । पटाखे भी जलाए जाते हैं । कहीं-कहीं पर तो ऑर्केस्ट्राका भी आयोजन होता है; परंतु साथ ही साथ दूध, फल, उदबत्ती भी बांटी जाती है । पूजा की तैयारी के लिए लोग मिलकर पूरे रास्ते की सफाई करते हैं ।

उत्सव का स्वरूप

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

नहाय खाय

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है। 

लोहंडा और खरना

दूसरे दिन कार्तीक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।
शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।
 उषा अर्घ्य
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। ब्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

व्रत

छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’
ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं। किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।

सूर्य पूजा का संदर्भ

छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।
सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अघ्र्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।

सूर्योपासना की परंपरा

भारत में सूर्योपासना ऋग वैदिक काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गई है। मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो अभी तक चला आ रहा है। तालाब में पूजा करते हैं।

देवता के रूप में

सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के विकास के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रारंभ हो गई, लेकिन देवता के रूप में सूर्य की वंदना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है। इसके बाद अन्य सभी वेदों के साथ ही उपनिषद आदि वैदिक ग्रंथों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई है। निरुक्त के रचियता यास्क ने द्युस्थानीय देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर रखा है।

मानवीय रूप की कल्पना

उत्तर वैदिक काल के अंतिम कालखंड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी। इसने कालांतर में सूर्य की मूर्ति पूजा का रूप ले लिया। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया। अनेक स्थानों पर सूर्य देव के मंदिर भी बनाए गए।

आरोग्य देवता के रूप में

पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पाई गई। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव विशेष पाया। संभवत: यही छठ पर्व के उद्भव की बेला रही हो। भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गई, जिसके लिए शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया था।

पौराणिक और लोक कथाएँ

छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं।

सामाजिक/सांस्कृतिक महत्व

छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडालों और भव्य मंदिरों की जरूरत होती है न ऐश्वर्य युक्त मूर्तियों की। बिजली के लट्टुओं की चकाचौंध, पटाखों के धमाके और लाउडस्पीकर के शोर से दूर यह पर्व बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद, और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।
शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गई उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रंथ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थअना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के साथकी जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाइ, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबंधन, तालाव या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।

Sunday, November 13, 2011

पहले दो, पीछे पाओ

यह विचारणीय प्रश्न है कि महापुरुष अपने पास आने वालों से सदैव याचना ही
क्यों करता है? मनन के बाद मेरी निश्चित धारणा हो गई कि त्याग से बढ़कर
प्रत्यक्ष और तुरंत फलदायी और कोई धर्म नहीं है। त्याग की कसौटी आदमी के
खोटे- खरे रूप को दुनिया के सामने उपस्थित करती है। मन में जमे हुए
कुसंस्कारोँ और विकारोँ के बोझ को हल्का करने के लिए त्याग से बढ़कर अन्य
साधन नहीं हो सकता।
आप दुनिया से प्राप्त करना चाहते हैं, विद्या, बुद्धि संपादित करना चाहते
हैं, तो त्याग कीजिए। गाँठ में से कुछ खोलिए। कोई नियामत लूट के माल की
तरह मुफ्त नहीं मिलती। दीजिए, आपके पास पैसा, रोटी, विद्या, श्रद्धा,
सदाचार, भक्ति, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ हो, मुक्त हस्त होकर दुनिया को
दीजिए, बदले में आपको बहुत कुछ मिलेगा। गौतम बुद्ध ने राजसिंहासन छोड़ा,
गाँधी ने बैरिस्टरी छोड़ी, उन्होंने जो छोड़ा था उससे अधिक पाया। विश्व कवि
रवींद्र नाथ टैगोर ने अपनी एक कविता में कहते हैं, "उसने हाथ फैला कर मुझ
से कुछ माँगा। मैंने अपनी झोली में से अन्न का एक दाना उसे दे दिया। शाम
को मैंने देखा कि झोली में उतना ही छोटा सोने का दाना मौजूद था। मैं फूट-
फूट कर रोया कि क्यों न मैंने अपना सर्वस्व दे डाला, जिससे मैं भिखारी से
राजा बन जाता।"
- अखण्ड ज्योति, मार्च- 1940, पृष्ठ 9

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durgadatt c.

Thursday, November 10, 2011

उद्देश्य ऊँचा रखें

मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते हैं, उतनी आसानी से सोना नहीं
मिलता। इसी तरह पापोँ की ओर आसानी से मन चला जाता है, किंतु पुण्य कर्मों
की ओर मन को प्रवृत्त करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा
नीचे पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किंतु यदि पानी ऊँचे स्थान पर
चढ़ाना हो तो, कुछ विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है।
बुरे विचार, तामसी संकल्प बड़ा मनोरंजन करते हुए मन में घर बना लेते हैं
और साथ ही अपनी मारक शक्ति को भी ले आते हैं। स्वार्थपूर्ण नीच भावनाओं
का वैज्ञानिक विश्लेषण कर के पता चला है कि वे काले रंग की छुरियोँ के
समान तीक्ष्ण एवं तेजाब की तरह दाहक होती हैं।
विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्वों की भाँति खींचने और खिँचने की विशेषता
होती है। स्थान मिलने पर अपनी भावना को पुष्ट करने वाले एक ही जाति के
विचार उड़ उड़ कर एकत्रित होने लगते हैं। यह तथ्य बुरे, तामसी विचार और भले
विचार सभी के संबंध में सत्य है।
जिन्होंने बहुत समय तक बुरे, तामसी और स्वार्थपूर्ण विचारों को अपने मन
में स्थान दिया है, उनके लिए इन विचारों को बाहर निकालना बहुत कठिन होता
है और ऐसे लोगों को चिंता, भय और निराशा जैसी परेशानियों का शिकार होना
ही पड़ेगा।

Sunday, November 6, 2011

उठो! हिम्मत करो

स्मरण रखिए, रुकावटें और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों
का ठीक- ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए
हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में
रुकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जीवन का स्वाद
ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी- बड़ी
कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन
कहला सकता है।
उठो! उदासीनता त्याग दो। प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं।
उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा है। उन्होंने जो श्रम आपके
ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह जीवन तभी तक दुःखमय दिखता
है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही
वृक्ष का उद्भव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध करते
हैं।
सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतोँ का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान
है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस
विश्वास द्वारा आप सब कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके
सामने ठहर नहीं सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आंतरिक
शक्तियों का विकास करेगा।
- अखण्ड ज्योति, फरवरी 1940, पृष्ठ 9

Wednesday, September 14, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 5

सोने के लिए हमारे पास समय काफी कम बचा था और थकान काफी थी इसलिए हमने
अपने मोबाइल फोन में अलार्म सेट कर दिए थे। शाम को पूछताछ करने के बाद
हमने यह अनुमान लगाया था कि कटरा से सुबह करीब साढ़े छः बजे निकला जाए तो
जम्मू नौ बजे तक पहुँचा जा सकता है। हम सुबह छः बजे होटल से निकले। योजना
यह थी कि पहले माँ और
आदित्य जम्मू के लिए जाएँगे। उनकी गाड़ी सुबह नौ बजे थी- दिल्ली के लिए।
दरअसल उन्हें पुणे जाना था और जम्मू से पुणे के लिए सीधी ट्रेन है- झेलम
एक्सप्रेस, लेकिन चूँकि हमारा कार्यक्रम काफी जल्दबाजी में बना था इसलिए
उस गाड़ी में उन्हें टिकट मिल नहीं पाया था और उन्हें पहले दिल्ली और बाद
में वहाँ से पुणे जाना था। हमारी गाड़ी रात को लगभग नौ बजे थी इसलिए हम
बाद में आराम से निकलने वाले थे। हम होटल से निकल कर बस स्टैंड की तरफ आए
तो पिछली शाम की स्थिति बिल्कुल बदल चुकी थी। माँ वैष्णो देवी के
दर्शनार्थियोँ की भारी भीड़ लम्बी पंक्तियों में खड़ी थी यात्रा पर्ची लेने
के लिए। पुलिस ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रबंध किए थे लेकिन वे
नाकाफी सिद्ध हो रहे सड़कों पर भारी जाम लगा था। कल तक जिन टैक्सी का
किराया छः सौ रुपए था आज वह बढ़कर नौ सौ से ज्यादा हो गया था। हम सब को
साथ जाना होता तो शायद हम टैक्सी ही बुक करते लेकिन दो लोगों के लिए इतना
किराया देकर पूरी टैक्सी बुक करना हमें जँच नहीं रहा था। तभी जम्मू की बस
आ गई और हमने माँ और आदित्य को बस से भेजने का निर्णय लिया। लेकिन हमारा
यह निर्णय बिल्कुल गलत साबित हुआ और इसका हमें काफी नुकसान उठाना पड़ा।
पूरे रास्ते में जाम लगा था और जम्मू में बस के लिए बड़ी गाड़ी होने की वजह
से रूट भी अलग था। कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ कि बस समय से नहीं पहुँची और
ट्रेन छूट गई। यह चिंता का विषय था हमारे लिए। लेकिन आदित्य ने काफी
सूझबूझ से काम लिया। उन्होंने अपना टिकट रद्द कराया और अगली गाड़ी में
सामान्य दर्जे का टिकट लिया क्योंकि उस गाड़ी का आरक्षण बंद हो चुका था।
शुक्र यह था कि उन्हें बैठने की जगह मिल गई थी गाड़ी में। दूसरी राहत की
बात यह थी कि दिल्ली से उन्हें दूसरी गाड़ी पकड़नी थी और इस बीच मार्जिन
समय काफी अच्छा था। यदि ऐसा नहीं होता तो लगभग एक हजार नौ सौ किलोमीटर की
यात्रा काफी दुरूह बन जाती।
माँ और आदित्य के जाने के बाद स्थिति को देखते हुए हमने समय से काफी पहले
निकलने का निर्णय लिया। टैक्सी के लिए काफी कोशिश की हमने लेकिन साढ़े आठ
सौ रुपए से कम में कोई तैयार नहीं हो रहा था और दूसरी तरफ हम इस तरह
ज्यादा किराया देने को तैयार नहीं थे। अभी दोपहर के बारह बज रहे थे और
हमारे पास समय काफी था। आखिर काफी मेहनत के बाद एक सज्जन मिल गए जो हमें
साढ़े छः सौ रुपए में जम्मू छोड़ने को तैयार हुए। कटरा से जम्मू आने में
हमें तीन घंटे से ज्यादा समय लगे और हम करीब शाम पाँच बजे जम्मू पहुँचे।
जम्मू स्टेशन पर प्रवेश करने से पहले यात्रियों की काफी जाँच पड़ताल होती
है और चौदह अगस्त की शाम होने से हमें कुछ ज्यादा ही सख्ती झेलनी पड़ी।
स्टेशन पर अपना सामान व्यवस्थित रखने के बाद सबसे पहले हमने भोजन की
समुचित व्यवस्था की क्योंकि हमें जोरों की भूख लग रही थी। इसके बाद मैंने
मेरे ससुरजी के टिकट का कंम्फर्म स्टेटस चेक किया क्योंकि पहले वह
प्रतीक्षा सूची में था। इसके बाद हमारे पास गाड़ी की प्रतीक्षा करने के
अलावा कोई काम नहीं बचा था। यह समय हमने आइसक्रीम खाते हुए और गाड़ी में
पढ़ने के लिए पत्रिकाएँ लेने में बिताया। अर्चना एक्सप्रेस जब प्लेटफार्म
पर आई तो काफी मशक्कत के बाद हम अपनी सीट तक पहुँचे। एक बढ़िया बात यह थी
कि जो यात्री थे केवल वही गाड़ी में थे। चढ़ाने वाला वहाँ कोई नहीं था।
वरना पटना से गाड़ी पकड़ते समय जितने यात्री थे उनसे दोगुने उन्हें छोड़ने
वाले थे और इस कारण से हमें काफी परेशानी उठानी पड़ी थी।
गाड़ी अपने नियत समय पर जम्मू से
निकली। अगले दिन
अखबार पढ़कर पता चला कि हमारे दर्शन करके वापस लौटने के कुछ ही घंटों के
बाद जबर्दस्त बारिश की वजह से अधकुँवारी के पास भू- स्खलन हुआ था जिसमें
कम से कम दो लोग मारे गए थे और एक दर्जन लोग घायल हो गए थे। कटरा में
एम्बुलेँस और पुलिस की भागदौड़ को हमने स्वतंत्रता दिवस की तैयारी का एक
हिस्सा समझ कर नजरअंदाज कर दिया था।
इस तरह एक हफ्ते की यात्रा में अनुष्का का मुंडन करके काफी घूमते फिरते,
सबसे मिलते हुए माताजी के दर्शन करने के बाद हम अपने घर की तरफ वापस चल
पड़े थे...

Wednesday, August 31, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 4

भैरव नाथ के मंदिर से कटरा की तरफ उतरने पर ढलान काफी तेज है और यात्री भी थके होते हैं। पैरों के थके होने से ढलान पर गति को नियंत्रित कर पाना भी कठिन होता है और ढलान के साथ तेज उतरना भी। माँ, पिताजी और ससुरजी तीनों ही काफी थक चुके थे। सुबह नहाने से हमारे पास कुछ गीले कपड़े थे और साथ में प्रसाद के कुछ थैले भी। दरअसल जम्मू के लिए निकलते समय कुछ मित्रों ने प्रसाद के लिए पैसे दिए थे और उनका प्रसाद भी हमारे साथ था। इन सब से हमारा सामान पहले से अधिक भारी हो गया था और इसका बड़ा भाग मेरे छोटे भाई साहब आदित्य के कंधों पर था। अनुष्का को लेकर चलते हुए मेरे कंधे भी जवाब दे रहे थे। इसलिए हमें चलने में काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। पर मेरे पिताजी और ससुरजी मेरी माँ और पत्नी प्रीति की धीमी चाल के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे। वे थोड़ी दूर आगे निकल जाते और फिर हमारे पहुँचने की प्रतीक्षा करते। अधकुँवारी से कुछ दूर पहले रुक कर पिताजी और ससुरजी हमारा इंतजार कर रहे थे और चाय भी पी रहे थे। जब हम पहुँचे तो उनकी चाय खतम हो रही थी इसलिए वे आगे बढ़ गए और हम रुक कर चाय पीने लगे। आदित्य को भी धीमे चलने से भार ज्यादा महसूस हो रहा था सो वे आगे बढ़ना चाहते थे। इसलिए हमने उन्हें भी यह कहकर जाने दिया कि जब थक जाएँ तो वहीँ रुक कर इंतजार करें।
हमने चाय पी और फिर आगे बढ़े। यहाँ से एक समस्या शुरू हुई लेकिन हमें इसका आभास नहीं हुआ। अब हम दो दलों में बँट गए थे- पहले दल में मेरे पिताजी, ससुरजी और आदित्य थे और दूसरे दल में मैं, मेरी माँ और प्रीति मेरी पत्नी थे। वो आगे चल रहे थे और हम थोड़ा पीछे लेकिन हमारी गति कम होने से दोनों दलों के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी। हम अधकुँवारी पहुँचे थोड़ा रुके और फिर आगे बढ़े। हमें थोड़ा आश्चर्य हो रहा था कि दूसरा दल यहाँ हमारे लिए रुका नहीं और सीधे आगे बढ़ गया। खैर कछुए की धीमी रफ्तार से चलकर हम जब नीचे मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुँचे तो शाम के पाँच बज रहे थे। हमने अपने दूसरे दल के लोगों को तलाशने की कोशिश की लेकिन वहाँ कोई नहीं दिखा तो हम बाहर निकल आए क्योंकि बाहर ही प्रायः लोग अपने पीछे से आते साथियों की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन आश्चर्य यहाँ भी कोई नहीं था। अब हम थोड़े परेशान भी थे और थोड़ी खीझ भी आ रही थी आखिर कहाँ जा कर बैठे हैं यह लोग। मैं अपने दल को छोड़कर उनकी तलाश में पीछे भी नहीं जा सकता था। हमने करीब पौन घंटा इंतजार किया कि शायद कहीं पीछे ही बैठे होंगे तो आ जाएँगे। जम्मू में एक और समस्या है- वहाँ सिर्फ पोस्ट पेड मोबाइल कनेक्शन ही चालू रहते हैं, प्री पेड कोई भी कनेक्शन नहीं। हमारे पास सिर्फ एक ही एक्टिव मोबाइल था जो मेरे पास था बाकी सभी के मोबाइल बंद थे। इस वजह से भी अब हमें काफी परेशानी थी। तभी आदित्य ने एक पे फोन से मुझे फोन किया तब हम कुछ आश्वस्त हुए। लेकिन अभी तो चौंकने का समय था। आदित्य बाहर आए तो वे अकेले थे, पिताजी और मेरे ससुरजी उनके साथ नहीं थे! आदित्य ने बताया कि वे उसे अधकुँवारी से ही नहीं मिले। अब एक ही अनुमान शेष था और हमारे लिए संभावना भी। हमें विश्वास था कि अवश्य पिताजी थके होने के कारण मेरे ससुरजी को साथ लेकर होटल चले गए होंगे क्योंकि इस दल के साथ मैं और आदित्य थे। हमने करीब बीस मिनट प्रतीक्षा करने के बाद होटल चलने का निश्चय किया। मन में एक ही बात आ रही थी कि काश वे दोनों लोग होटल पहुँच गए हों। लेकिन जब हम होटल पहुँचे तो पता चला कि वहाँ पिताजी नहीं पहुँचे हैं। अब परेशानी चिंता का सबब बन गई थी। हमने सबसे पहले एक कमरा बुक किया ताकि माँ और प्रीति को वहाँ छोड़ा जा सके। फिर हम वापस तीन किलोमीटर पीछे चलकर बाणगंगा गए। फिर हमने उद्घोषणा कक्ष में मिल कर पिताजी के लिए संदेश कहलवाया लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। फिर हमने मुख्य द्वार पर सुरक्षा कर्मियों से बात की और उन्हें खोजने अंदर गए। मैंने आदित्य को उद्घोषणा कक्ष के पास ही बैठा दिया ताकि संदेश सुनकर यदि पिताजी वहाँ आएँ तो मिल सकें। मैं पीछे चलता हुआ करीब बाणगंगा पहुँच गया लेकिन वे नहीं मिले। मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी। रात हो रही थी, यह लोग मिल नहीं रहे थे और अगली सुबह माँ और आदित्य की गाड़ी थी- पहले दिल्ली और बाद में वहाँ से पुणे के लिए। तभी मेरे ससुरजी का फोन आया जो उन्होंने होटल से किया था। मेरी तो जैसे जान में जान आ गई हो। लेकिन जब परेशानी आती है तो इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ती। उन्होंने बताया कि पिताजी काफी नीचे तक साथ आए थे लेकिन उसके बाद भीड़ में वे अलग हो गए थे। लेकिन उन्होंने बताया था कि वे बाणगंगा से आगे तक साथ में थे। इसलिए मैं फिर वापस उन्हें खोजता हुआ नीचे आने लगा। मुख्य द्वार पर आकर आदित्य से मिला। तभी मुख्य द्वार के पास ही पिताजी दिखाई दिए। अभी तक न जाने कितने संस्करणोँ में अनगिनत शंकाएँ आ रही थी वे सब जैसे एक साथ विलीन हो गईं। हम पिताजी को लेकर होटल पर आए, ससुरजी को साथ लिया और कमरे पर पहुँचे तब करीब साढ़े आठ बजे थे। दरअसल हुआ यह था कि आदित्य पिताजी और ससुरजी से शुरू से ही अलग हो गया था। उसे लगा था कि वे पीछे ही चल रहे हैं लेकिन भीड़ में वे अलग हो गए थे। इसके बाद पिताजी और ससुरजी अधकुँवारी में रास्ते से हटकर एक बेँच पर बैठकर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे लेकिन न हम उन्हें देख पाए न वे हमें जबकि हम भी वहीँ आगे कुछ देर बैठे थे। आदित्य सीधे बाणगंगा आए थे और रास्ते से हटकर एक किनारे बैठ कर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे और बैठे बैठे सो गए थे। बाणगंगा के आगे आकर पिताजी और ससुरजी अलग हो गए थे। ससुरजी को लगा कि पिताजी आगे आ गए हैं और पिताजी को लगा कि ससुरजी पीछे ही हैं।
सुबह नौ बजे माँ की गाड़ी थी इसलिए समय बहुत कम बचा था और पैकिँग आदि बहुत काम बचे थे। हम फटाफट क्लोक रूम से सामान लेकर आए, खाना खाया और पैकिँग शुरू की। मैं पैरों में दर्द को कम करने की एक दवाई ले आया जिसे लगाने के बाद थोड़ा आराम मिला। पैकिँग खतम होने तक करीब ग्यारह बज चुके थे।

Sunday, August 28, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 3

दो वर्ष से पाँच वर्ष के बच्चों को संभालना बच्चों के मामले में शायद सबसे कठिन काम है। वे न तो एकदम छोटे बच्चों जैसे हर बात को मानने को तैयार होते हैं न बड़े बच्चों जैसे समझदार होते हैं। हर बात में अत्यंत उत्सुक और हर चीज को स्वयं आजमाने को तैयार! न तो गोद में चलने को तैयार न ज्यादा देर तक पैदल चलने में सक्षम! इन बच्चों की इसी प्रवृत्ति के कारण अत्यंत सावधानी से इनकी देखभाल करनी पड़ती है। इस मामले में हम भी अपवाद नहीं थे। अनुष्का के लिए वैसे तो वैष्णो देवी की यह दूसरी यात्रा थी पर पहली बार वह सिर्फ सात माह की थी। उस समय का एक अलग अनुभव है जिसे अलग लिखना ही उचित होगा। इस बार की स्थिति बिलकुल अलग थी। भीड़ में बच्चों के गुम होने का अंदेशा रहता है। पैदल चलते समय ठोकर खा कर चोटिल होने की संभावनाएँ रहती हैं। यात्रा के दौरान बार बार वातावरण बदलने से भी उनके बीमार पड़ने की संभावना रहती है। खान पान की एक तो फर्माईशेँ और नियंत्रण करना भी जरूरी होता है। सब मिला कर काफी सावधानी रखनी पड़ती है और कार्य काफी कठिन है। अनुष्का के लिए पिठ्ठू हम दो लोग थे- मैं और मेरे छोटे भाई आदित्य। सामान हमने सिर्फ जरूरत का ही साथ लिया था लेकिन बारिश को देखते हुए अतिरिक्त कपड़े रखना आवश्यक था और इस वजह से भार भी बढ़ना ही था। उसे हम सब ने मिलकर बाँट लिया था लेकिन उसका भी एक बड़ा भाग हमारे ही पास था। आपको एक और बात बता दूँ- कटरा से आगे बढ़ने से पहले श्राईन बोर्ड के कार्यालय से एक यात्रा पर्ची लेना आवश्यक है। यह एक तरह से पंजीकरण है जिससे यात्रियों का हिसाब रखना संभव हो पाता है। इसके लिए दल का कोई भी एक सदस्य जा कर अपने दल का विवरण बता कर पर्ची ले सकता है। यह पर्ची साथ रखना आवश्यक है। कटरा से भवन तक के करीब चौदह किलोमीटर के दौरान कई चेक पोस्ट हैं जहाँ सभी यात्रियों की उनके सामान के साथ तलाशी होती है। यह यात्रियों की सुरक्षा के जरूरी भी है। मुख्य प्रवेश द्वार के बाद बाणगंगा पहला चेक पोस्ट है। यह करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है। यात्रा पर्ची लेने के बाद छः घंटे के भीतर इस चेक पोस्ट को पार करना यात्रियों के लिए आवश्यक है।
यात्रा में शुरू के तीन चार किलोमीटर थोड़े ज्यादा थकाने वाले होते हैं उसके बाद शरीर अपने को अनुकूलित कर लेता है। मुझे प्रसन्नता होती है अपने माँ पिताजी के स्वास्थ्य को देखकर। मेरे पिताजी की आयु अभी 68 वर्ष है जबकि माँ की आयु 62 वर्ष है लेकिन वे अपने बगल में चलने वाले कई युवाओं के लिए भी मिसाल थे। वैसे वे भी अपवाद नहीं थे- आपको अनेकोँ बुजुर्ग व्यक्ति मिल जाएँगे। करीब छः किलोमीटर आगे अधकुँवारी का मंदिर है। यह एक गुफा में है। यदि आपको यहाँ दर्शन करने हैं तो वहीँ काउंटर से एक और पर्ची लेनी होती है जिस पर आपका समूह क्रमांक लिखा होता है जिसके अनुसार आपको गुफा में प्रवेश की अनुमति मिलती है। एक समूह में पचास लोग होते हैं। यदि आपके पास समय कम है तो आप सीधे माता के भवन की तरफ आगे बढ़ सकते हैं। हमारे दल में बच्चे और बुजुर्ग होने की वजह से हमने भी आगे बढ़ने का ही फैसला किया। दरअसल हमें समूह संख्या 267 मिली थी जबकि अभी 145वें समूह की बारी थी जो शाम आठ बजे प्रवेश करने वाला था। इसका अर्थ यह था कि हमें अपनी बारी के लिए शायद रात भर खुले आसमान के नीचे बैठना पड़ता। यात्रा का दूसरा सबसे कठिन भाग अंतिम तीन चार किलोमीटर का होता है। तब तक अधिकांश लोग थक चुके होते हैं और साथ ही मानसिक रूप से भी पहुँचने की जल्दबाजी होती है। इस भाग में चढ़ाई भी थोड़ी कठिन है। शायद इसी बात को अनुभव करके इस भाग में पहले हर आधे किलोमीटर पर हर फिर ढाई सौ मीटर पर संकेतक लगे हैं जो यात्रियों को हिम्मत देते हैं। हम करीब रात के साढ़े दस बजे ऊपर पहुँचे- करीब नौ घंटे में! कई लोग यहाँ पहुँचने के बाद सीधे दर्शन के लिए चले जाते हैं। लेकिन हमने रात में ठहरने का फैसला किया। यात्रियों की सुविधा के लिए ट्रस्ट की तरफ से कम्बल दिए जाते हैं। इसके लिए कई स्टोर बनाए गए हैं जहाँ आप यात्रा पर्ची दिखाकर प्रति कम्बल सौ रुपए की अमानत राशि देकर अपनी जरूरत के अनुसार कम्बल ले सकते हैं। कम्बल वापस करने पर आपके पैसे वापस मिल जाते हैं। भीड़ होने की वजह से किसी छत के नीचे जगह मिलनी मुश्किल थी। रास्ते ही ऐसी खाली जगह बचे थे जिनके ऊपर छत थी। सो हमने भी अन्य लोगों की तरह रास्ते के किनारे ही कम्बल बिछा दिया। करीब तीन बजे सुबह हम उठे और शौचादि करके स्नान किया। करीब एक घंटे में हम तैयार हो गए। अपने कम्बल जमा कर दिए। यहाँ भी दर्शन के लिए समूह संख्या लेना आवश्यक है। दर्शन के लिए जाते समय कैमरा, पर्स, बेल्ट, पेन, थैले, किसी तरह की खाने पीने की कोई चीज, चप्पल आदि कुछ भी साथ ले जाना सख्त मना है। इन सब चीजों को सुरक्षित रखने हेतु यहाँ कई निःशुल्क क्लोक रूम बनाए गए हैं जिनका उपयोग आप कर सकते हैं। हम बिल्कुल ठीक समय पंक्ति में लग गए। दरअसल इस समय भीड़ कम होती है इस समय सीधे यहाँ पहुँचने वाले कम होते हैं और जो पहले पहुँच चुके होते हैं वे अलसा कर आराम कर रहे होते हैं। हमने निश्चिँत होकर ब्रह्म मुहुर्त में माताजी के दर्शन किए। इसके बाद सुविधा अनुसार दान आदि किया। नाश्ता किया। चाय पी। इसके बाद अगले गंतव्य की ओर निकले- भैरव नाथ के मंदिर के लिए। यह मंदिर माता के मंदिर से करीब ढाई किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसी मान्यता है कि माता के दर्शन के बाद भैरव नाथ के दर्शन करने पर ही माता का दर्शन सफल होता है। यह थोड़ा कठिन है क्योंकि चढ़ाई कठिन है और यात्री थके होते हैं। माँ काफी थक गईं थी इसलिए हमने उनके लिए एक खच्चर कर लिया। यहाँ थोड़ी परेशानी है- खच्चर वाले मनमाना किराया माँगते हैं। हालाँकि इसके लिए कई काउंटर बने हैं लेकिन उनका कोई लाभ नहीं है। खैर हमने भैरव नाथ के दर्शन किए। इसके बाद हमने वहीँ बने जलपान गृह में अपनी पसंद के अनुसार खाना खाया और नीचे उतरना शुरू किया। इसके लिए पुनः भवन आने की जरूरत नहीं है। वहीँ से रास्ता है।

Monday, August 22, 2011

हमारी हरिद्वार एवं जम्मू की यात्रा- 2






हरिद्वार से जम्मू के लिए हम कुल सात लोग थे- छः बड़े और एक अनुष्का। शाम के करीब साढ़े पाँच बजे गाड़ी आई। आधे घंटे के अपने विराम के बाद गाड़ी चली। हम कुछ देर तक हरिद्वार को पीछे छूटते हुए देखते रहे उसके बाद खाने पीने का कार्यक्रम शुरू हुआ, हाँ पीने में सिर्फ पानी का ही प्रावधान था। भोजन का कार्यक्रम जल्दी इसलिए शुरू करना पड़ा क्योंकि हम जम्मू सुबह पाँच बजे पहुँचने वाले थे इसलिए उससे पहले नींद पूरी होना जरूरी था। थके थे इसलिए जब नींद खुली तो गाड़ी जम्मू स्टेशन पहुँचने वाली थी। हरिद्वार से जम्मू के लिए यह एक ही सीधी गाड़ी है- हेमकुंत एक्सप्रेस। इस गाड़ी का समय थोड़ा असुविधाजनक है- हरिद्वार में भी और जम्मू में भी। सुबह जब गाड़ी जम्मू पहुँची तो सब शौचादि जैसे नित्य क्रियाओं के बेचैन दिखाई दे रहे थे लेकिन सुबह पाँच बजे हम शौचालय कहाँ खोजेँ? मजबूर होकर लोगों को स्टेशन पर खड़ी गाड़ी में ही अपना काम निपटाना पड़ा। हमने भी लोगों का अनुसरण किया। जम्मू आने का उद्देश्य था माँ वैष्णो देवी के दर्शन करना लेकिन उससे पहले स्नान आदि करने जैसे जरूरी काम निपटाने थे। जम्मू स्टेशन के ठीक बाहर दाहिनी ओर श्री माँ वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड का 'वैष्णवी धाम' है जहाँ दर्शनार्थियोँ के ठहरने की व्यवस्था है। हम सबसे पहले वहीँ पहुँचे लेकिन हमें निराशा ही मिली। वहीँ चेक इन और चेक आउट समय सुबह नौ बजे है। मुझे यह समझ में नहीं आया कि देश के कोने कोने से आने वाले भक्त इस समय का ध्यान कैसे रख पाएँगे। और ऐसे में यह व्यवस्था उनकी सहायता और बीचौलियोँ से बचाव कैसे कर रही है। आखिर हमने सीधे कटरा जाने का निर्णय किया लेकिन सामान के जाने का एक ही रास्ता है- टैक्सी बुक करें। सो हमने किया। एक और बात- यदि आप टैक्सी स्टैंड जाएँगे तो पाँच आदमी के कम से कम साढ़े आठ सौ रुपए खर्च करने पड़ेंगे लेकिन बाहर से यही टैक्सी छः सौ रुपए में भी मिल जाएगी। किसी धोखा की संभावना नहीं है। हमने भी किया। रास्ते में ही जबरदस्त बारिश शुरू हो गई। ड्राइवर ने बताया कि पिछले तीन दिनों से भू स्खलन के कारण रास्ता बंद था, एक दिन पहले ही शुरू हुआ है। हम कटरा पहुँचे तो बारिश जारी थी। हमें मजबूर हो कर महँगे कमरे किराए पर लेने पड़े। नहा धोकर हमने खाना खाया। एक घंटे आराम किया। फिर हम निकलने को तैयार हुए- बारिश में ही। एक अच्छी बात यह है कि कटरा में खास बरसाती मिलते हैं जिन्हें पहन कर आप भीगे बगैर जा सकते हैं। कीमत सिर्फ दस रुपए। इसके अलावा एक सुविधा और भी है- आप होटल से चेक आउट करने के बाद भी उनके क्लोक रूम में अपना सामान रख सकते हैं, निःशुल्क। तो करीब दो बजे हम निकल पड़े माता के भवन की तरफ। यह करीब चौदह या पंद्रह किलोमीटर की यात्रा है। इसे आप अपनी सुविधानुसार पैदल या खच्चर की सहायता से पूरा कर सकते हैं। इसके अलावा पालकी और हैलीकॉप्टर की सुविधा भी है। लेकिन कीमत ज्यादा है कम से कम मेरे लिए। हमारे दल में तीन बुजुर्ग थे और एक बच्ची थी। तीन मझले आकार के थैले भी थे। लेकिन दल में उत्साह पूरा था इसलिए कोई परेशानी नहीं थी। हम पहले कुछ देर तेजी से फिर धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे। जगह जगह जलपान आदि की सुविधा है। सुस्ताने के लिए बेँच लगी हैं। शौचालय आदि भी हैं। बारिश भी जैसे सिर्फ हमारी परीक्षा के लिए ही आई हो। जैसे ही हम होटल से निकले, थोड़ी देर बाद ही बंद हो गई।

Sunday, August 21, 2011

हमारी हरिद्वार और जम्मू की यात्रा- 1







पिछले कई महीनों से हम योजना बना रहे थे- मेरी बेटी के मुंडन संस्कार की। पहले यह फरवरी, 11 में ही होना था पर मेरे भाई की शादी की वजह से नहीं हो पाया। उसके बाद हमने अक्तूबर का कार्यक्रम बनाया- दशहरे के ठीक बाद का। इसका एक कारण तो यह था कि मुंडन हरिद्वार में शांतिकुंज में होना था, सो दशहरे की छुट्टियां काम में आ जातीं और दूसरा स्कूलों में छमाही इम्तहान होने से गाड़ियों में और पर्यटन स्थलों पर भीड़ कम होती है जिससे वाजिब कीमतों में उचित व्यवस्था हो जाती है। इस विचार के साथ हमने गाड़ियों (रेल) के टिकट भी बुक कर लिए। लेकिन यह दूसरा कारण ही हमारे सामने दूसरे रूप में अड़चन बन गया। मेरे छोटे भाई साहब जो पुणे में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं उनके इम्तहान भी अक्तूबर में ही पड़ गए और मैं उन्हें छोड़कर यह कार्यक्रम करना नहीं चाहता था। अब हमारे सामने दो विकल्प थे- एक, या तो कार्यक्रम भादो (भाद्रपद) शुरू होने से पहले निपटा लें या दूसरा, इसे फरवरी तक टाला जाए क्योंकि अक्तूबर के बाद ठंढ बढ़ने लगती है। बात यही तय हुई कि टालने की बजाए अगस्त में ही निपट लिया जाए। यह सारा निर्णय जुलाई के पहले हफ्ते हुआ। समय बहुत कम था और तैयारियाँ काफी करनी थी। कुल मिलाकर पंद्रह से बीस लोगों को लेकर हरिद्वार की सैर करनी थी। हमारे उत्तर प्रदेश और बिहार की रिश्तेदारी भी काफी कठिन हो गई है। किसी को न बुलाओ तो समस्या और बुलाओ तो समस्या! कोई पुणे से, कोई बोकारो से, कोई दिल्ली से, कोई गुडगाँव से और कोई बलिया से! सबके टिकट बुक कराओ, उन्हें स्टेशन पर लेने जाओ आदि आदि। अपनी तैयारी अलग से। कार्यक्रम में एक और विस्तार यह हुआ कि रिश्तेदारोँ को विदा करने के बाद जम्मू, माँ वैष्णो देवी के दर्शन का निर्णय हुआ।
खैर आठ अगस्त को मैं, मेरी श्रीमतीजी, पिताजी, मेरे ससुरजी, मेरी सालीसाहिबा और साथ में अनुष्का- मेरी ढाई वर्ष की बेटी पटना से हरिद्वार के लिए निकले। बाकी लोगों के टिकट उनकी सुविधा के अनुसार उनके पास भेज दिए गए थे और वे सीधे हरिद्वार पहुँचने वाले थे। हमारी गाड़ी रात के नौ बजे थी। हम समय से स्टेशन पहुँच गए थे। स्टेशन का नाम मतलब भीड़ और शोर। उस पर गाड़ी एक घंटे देर से आ रही थी। हम इंतजार के अलावा कर भी क्या सकते थे? आखिर जब गाड़ी आई तो वह लगभग ढाई घंटे देर से चल रही थी और रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। लेकिन अभी तो शुरुआत हुई थी। सावन का महीना था और भोलेनाथ के दर्शन को निकले काँवड़ियोँ की भीड़ गाड़ी में भरी थी और वे सारी खाली सीटों पर कब्जा जमाए थे। उनसे सीट खाली कराना रात में एक कठिन काम साबित हुआ। कोई टिकट चेकर नहीं! पाँच में से चार सीटें तो उन्होंने खाली कर दीं- बुजुर्गों और महिलाओं का खयाल करके। इसके लिए मैं उनको धन्यवाद देना चाहूँगा। लेकिन मेरी सीट मुझे शेयर करनी पड़ी- मुगलसराय तक, लगभग तीन घंटे। बनारस में वे उतर गए। सुबह हमें ध्यान आया कि गाड़ी में रसोई यान (पैँट्री कार) नहीं है। गाड़ी सुपरफास्ट, रुकने का नाम नहीं ले रही थी। नाश्ता और खाना तो हमारे पास था लेकिन पानी के लिए क्या करें? भारतीय रेल का नियम- गाड़ी का स्टॉप नहीं है लेकिन गाड़ी रुकेगी- या तो स्टेशन के पहले या स्टेशन पर प्लेटफार्मोँ के बीच मेन लाइन पर लेकिन प्लेटफार्म पर नहीं। आखिर लखनऊ में हमने पानी लिया और नाश्ता किया। गाड़ी का हरिद्वार में समय शाम सवा चार बजे था लेकिन तीन घंटे विलम्ब के अनुसार हमने सात बजे के लगभग पहुँचने का अनुमान लगाया था अर्थात वो शाम बेकार! लेकिन भला हो रेल्वे का, गाड़ी ने पूरा समय कवर करते हुए हमें बिल्कुल ठीक समय पर हरिद्वार पहुँचा दिया। काफी दिन बाद सब एक दूसरे से मिले। काफी उत्साह का माहौल रहा। हमारी परंपराओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सबका मिलना हो जाता है वरना आज के व्यस्त और नौकरीपेशा जीवन में कहाँ मिलना हो पाता है। खैर सब पहुँच गए थे और बातें करते हुए सब तैयार हुए और हम गंगाजी की आरती देखने हर की पौड़ी पहुँचे। लौट कर बस एक ही चीज जरूरी थी- खाना खाओ और बिस्तर पकड़ो। आखिर सब थके हुए थे। हम एक ट्रस्ट के आश्रम में रुके थे। लक्जरी होटल नहीं लेकिन काफी अच्छी सुविधा थी। लंगर के रूप में खाने के स्वाद का तो कहना ही क्या! अगले दिन सुबह मुंडन था। वैसे तो मुंडन का समय दस बजे से था लेकिन हम शांतिकुंज सुबह छः बजे ही पहुँच गए। वहाँ सामूहिक यज्ञ में सम्मिलित हुए। लगभग पच्चासी वर्ष से जल रहे अखंड दीपक के दर्शन किए। सबने नाश्ता वगैरह किया। उसके बाद हम हिमालय के मंदिर गए। ध्यान के लिए एक काफी अच्छी जगह है। दरअसल शांतिकुंज अखिल विश्व गायत्री परिवार का मुख्यालय है और साथ ही एक तीर्थ भी। हिंदू धर्म का एक जीता जागता रूप है। यहाँ वैज्ञानिक व्याख्या के साथ सारे संस्कार विधिवत कराए जाते हैं। करीब बारह बजे तक अनुष्का का मुंडन हो गया। उसके बाद हम गंगा पूजन के लिए पांडव घाट पहुँचे। हरिद्वार में गंगाजी की धार पटना के मुकाबले काफी ज्यादा रहती है, बारिश की वजह से यह और ज्यादा हो गई थी। हमने सावधानी से स्नान किया और पूजन किया। बारिश रुक रुक कर आ रही थी। उसी दिन शाम को कई लोगों को वापस निकलना था सो हम ज्यादा समय बर्बाद किए बिना वापस अपने कमरे में चले आए। अगले दिन हम बजे हुए लोग घूमने निकले। ऋषिकेश में राम झूला और लक्ष्मण झूला देखा लेकिन सबसे अच्छा प्राकृतिक सौंदर्य लगा जो दूर दूर तक दिखाई दे रहा था। बंदर तो मत पूछिए जहाँ देखो वहीँ। उसी दिन शाम को जम्मू के लिए हमारी गाड़ी थी सो लौटते हुए हम सामान लेकर सीधे स्टेशन पहुँच गए। गाड़ी फिर पौन घंटा देरी से!






Friday, August 5, 2011

भ्रष्टाचार की जड़ें- 2

ये घटना मेरे स्कूली शिक्षा के समय की है। हम सहपाठियोँ में कई मेरे गाँव के ही थे। हममें से कई वैसे तो अलग अलग स्कूलों में पढ़ते थे लेकिन स्कूल से लौटने के बाद साथ ही एक साथ ही खेलते थे।
उन दिनों हमारे गाँवों में सहकारी दुकानें थीं जिन्हें गाँव के लोग 'कोऑपरेटिव' भी कहते थे। इस दुकान से गाँववासियोँ को सस्ते दरों पर कपड़ा, शक्कर आदि मिलता था। मुझे याद है पिताजी हम दो भाइयों के लिए हमारे गाँव की दुकान से कपड़ा लाए थे जो काफी टिकाऊ था। हम सहपाठियोँ में से एक के पिताजी उस दुकान पर कार्यरत थे। इलाके के एक प्रभावशाली श्रीमंत के के यहाँ शादी थी सो उनके अतिथियों के सत्कार के लिए बनने वाले भोजन के लिए काफी मात्रा में शक्कर की आवश्यकता थी। मैं सिर्फ शक्कर की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि इसके अलावा उस दुकान में उनकी हैसियत के अनुसार और कुछ नहीं था। उनके वफादार चमचे (माफ करिएगा) अधिकारी ने गाँव के हिस्से की शक्कर उन श्रीमंत के हवाले कर देने का आदेश दे दिया। किंतु मेरे मित्र के पिताजी जो उस समय उस दुकान पर थे, ऐसा करने से मना कर दिया। किंतु उनकी ये ईमानदारी उनके लिए काफी महँगी पड़ी। दूसरे दिन उस दुकान पर औचक निरीक्षण हुआ! काफी बड़ी मात्रा में हेराफेरी पाई गई! उन्हें निलम्बित कर दिया गया और जाँच के आदेश दे दिए गए। काफी गहरा सदमा पहुँचा उन्हें। उनका वेतन उनके आमदनी का बड़ा हिस्सा था जो अब बंद हो चुका था। घर में तीन बच्चे बड़े हो रहे थे। उनका खर्च बढ़ रहा था। जाँच चल रही थी और उन्होंने अदालत की शरण भी ली। किंतु सदमे की मार और जिंदगी की लड़ाई ने उन्हें ज्यादा दिन जीने नहीं दिया। कहते हैं शौच के समय आदमी सबसे गहराई से सोचता है, शौच करते समय ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसे। परिवार पर तो पहले जैसे मुसीबतोँ का पहाड़ टूट पड़ा। घर के खर्च जुटाएँ या अदालत का। उत्तर प्रदेश और बिहार में लड़की की शादी भी एक मुसीबत ही कही जा सकती है। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। उन्हें घर के खर्च के लिए पहले खेतों में काम करना पड़ा। आखिर मुकदमे में मेरे मित्र की जीत हुई किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पढ़ाई बीच में छूट जाने के बाद उन्हें पंजाब जा कर मजदूरी करनी पड़ी। हमारे सहपाठियोँ में आज एक भी बेरोजगार नहीं है किंतु इस हादसे ने दो होनहार बच्चों को जबरन मजदूर बना दिया। मुझे खुशी है कि आज मेरे मित्र अपने मेहनत से अपनी गाड़ी फिर से लाइन पर ला पाए हैं। मेरे सहपाठी मित्र आज हीरो साइकिल में कार्यरत हैं।
ये एक सच्ची घटना है जिसने हमारे युवा होते मन पर गहरा प्रभाव डाला।

Thursday, August 4, 2011

सरकार के बजाए अपनी सुध लें

बिहार में और विशेषतः पटना में लोग अपनी जिम्मेदारियाँ जाने बगैर हर बात के लिए सरकार को दोष देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यदि मेट्रो से पटना की तुलना करना चाहते हैं तो नागरिक उत्तरदायित्वोँ को जानना एवं सीखना होगा। क्या हमने कोनोँ में थूकना बंद किया है? नहीं। क्या हमने सार्वजनिक जगहों को पेशाबघर समझना बंद किया है? नहीं। क्या हमने ऐसा करने वालों को टोकना शुरू किया है, नहीं। हम सड़क पर, घर के पीछे और हर ऐसी खाली जगह पर जहाँ कोई देख न रहा हो, कचरा फैलाते हैं और सफाई की बात करते हैं। पानी को बचाना नहीं जानते और पानी की कमी का रोना रोते हैं। राजधानी में रह कर भी बिजली चोरी को अपना अधिकार मानते हैं फिर बिजली के लिए सरकार को दोष देते हैं। महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में भी जो बिजली उत्पादन में देश में अव्वल है, शून्य विद्युत कटौती उन्हीं शहरों को मिल रही है जिनका बिल भुगतान का औसत शत प्रतिशत या उसके बहुत करीब है। हमलोग मुम्बई, चेन्नई, बंगलोर, हैदराबाद आदि शहरों में जाते हैं लेकिन क्या हम पंक्ति में रहकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करना सीख पाए हैं? नहीं, लेकिन हम व्यवस्था की बात करते हैं। सरकार को जितना करना चाहिए उससे अधिक कर रही है। अब यदि हम बिहार को विकसित देखना चाहते हैं तो जरूरी है कि हम अपने हिस्से का योगदान शुरू करें। 'अधिकारों का वह हकदार जिसको कर्तव्यों का ज्ञान'। और यदि नहीं तो जितना जी चाहे चिल्लाते रहो, जुगाड़ लगा कर लाइन के बाहर से अपना काम कराते रहो, आठ- दस घंटों की बिजली में इन्वर्टर की बैटरी चार्ज करते रहो, 'साइड इंकम' से अपना बैंक बैलेँस बढ़ाते रहो, दहेज देते और लेते रहो। राज और उद्धव ठाकरे जैसे लोगों को बिहार को बदनाम करते रहने दो- आपको क्या अंतर पड़ता है? लेकिन सड़क, बिजली, सफाई और व्यवस्था की बात कृपया मत करो।

Tuesday, August 2, 2011

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती...

"लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फ..."

Thursday, July 28, 2011

दो बच्चों का कानून

बिहार में रेहाना की बर्खास्तगी का मामला उम्मीद के अनुसार ही एक विवाद का स्वरूप
लेता जा रहा है। ये विवाद हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों की कुंठित मानसिक
स्थिति को इंगित करते हैं। देश हित में बनाए गए एक सर्वथा आवश्यक कानून
को जन विरोधी बता कर अपनी गलतियों को अपने फायदे के लिए सही साबित करना
अब इन राजनीतिक लोगों का हथकंडा बन चुका है। अतः इसमें जुटे लोगों में
क्षेत्रीय राजनीतिक लोगों को देखकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। रेहाना जैसे
लोगों के साथ इनको साथ देने वाले लोगों को भी जनहित व देशहित विरोधी
भावनाएँ भड़काने के आरोप में सरकारी दायित्वों से मुक्त कर देना चाहिए और
भविष्य में भी चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। यदि ऐसा कानून
नहीं है तो उसे बनाया जाना चाहिए। इस मुद्दे को धर्म से जोड़कर बच्चों को
भगवान का आशीर्वाद या अल्लाह की नेमत बताने वाले लोग ऐसे हजारों बच्चों की
सुध क्यों नहीं लेते जो अपने माँ बाप की गलतियों से सड़कों, रेलवे
स्टेशनों और ऐसे अन्य जगहों पर भीख माँगते हैं, उन बच्चों की सुध क्यों
नहीं लेते जो अपना बचपन भी पूरा नहीं कर पाते। क्या अल्लाह के नेमत की
उनके लिए इतनी ही कीमत है? इंसान की गलतियों को भगवान या अल्लाह पर थोपना
उचित नहीं है। ईश्वर ने इंसान को बुद्धि दी है ताकि वो अपना फायदा नुकसान
समझ सके और अपने कर्मों के लिए इंसान खुद ही जिम्मेदार है ईश्वर या
अल्लाह नहीं। आज परिवार नियोजन के कई साधन उपलब्ध हैं। इनमें से जो अपने
और अपने धर्म की मान्यताओं के अनुकूल लगे उन्हें उपयोग करना चाहिए और यदि
ऐसा नहीं करना है तो खुद पर संयम रखना सीखना चाहिए। अपनी जरूरतों को पूरा
करते हुए देश एवं समाज का ध्यान रखना भी जरूरी है। जो मान्यताएँ समय के
हिसाब से बदलती नहीं हैं वे बिखर जाती हैं और अपने मानने वाले को भी
तकलीफ पहुँचाती हैं। आज के समय में हमारे देश में आबादी का विकराल स्वरूप
हमारे विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है। इसे नियंत्रित करने का एकमात्र कारगर
तरीका परिवार नियोजन है और हमें इस तथ्य को समझना ही होगा। इसे बढ़ावा
देने के लिए कड़े कानून भी होने ही चाहिए और इसमें किसी धर्म या मान्यता
का कोई सरोकार नहीं है। रेहाना को अपने निजी फायदे से ऊपर उठकर कार्य
करना
चाहिए। उसे अपनी गलतियों को समझते हुए अन्य लोगों को भी परिवार नियोजन के
लिए प्रेरित करना चाहिए। इससे देश के साथ मुस्लिम समाज में भी एक
सकारात्मक मिसाल बनेगी। यदि वह सच में समाज सेवा करने को उत्सुक हैं तो
उन्हें ऐसा करना ही होगा, आगे उनकी मर्जी।

Monday, July 18, 2011

भ्रष्टाचार की जड़ें- 1- 1

पटना जैसे शहरों में बिजली की चोरी जोरों से चल रही है। लोग अपने घरों में बाकायदा चेँजओवर स्विच लगाए हुए हैं जिनसे वे रात में, मोटर वगैरह चलाते समय या फिर महीने में कुछ दिनों के लिए बिजली के मीटर को बायपास कर अपनी मर्जी के बिजली बिल में मनमानी बिजली उपयोग करते हैं। हद यह है ज्यादातर लोगों ने किराएदार रखे हैं जिनके लिए सब-मीटर लगे हैं और किराएदारोँ से बिजली बिल के नाम पर मोटी रकम भी वसूली जा रही है, अर्थात दोनों तरफ से फायदा। किराएदारोँ की कोई पक्की जानकारी नहीं ली जाती है न ही पुलिस में उनके बारे में कोई जानकारी दी जाती है जिससे शहरों में आपराधिक घटनाओं पर रोक लगा पाना असंभव होता जा रहा है। एक और बात- किराएदारोँ से मिलने वाली रकम के एवज में कोई रसीद नहीं दी जाती, माँगने पर भी नहीं- रहना है तो रहो नहीं तो कहीं और देखो! नौकरीपेशा किराएदार तो नकली रसीद जमा कर के अपने लिए टैक्स की छूट प्राप्त कर लेते हैं जबकि मकान मालिक भी अपनी आय को छिपा कर सरकारी खजाने को दोगुना चुना लगाते हैं।